क्या था ब्रह्मोस का वो राज जिसे लियोनोव अपने साथ ले गए? दुश्मन देशों के लिए अब भी है यह पहेली
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रूस के महान वैज्ञानिक अलेक्जेंडर लियोनोव का निधन डिफेंस सेक्टर के लिए एक बड़ी क्षति है. उन्होंने ही भारत और रूस के बीच उस दोस्ती की नींव रखी जिसने ‘ब्रह्मोस जैसी अजेय शक्ति को जन्म दिया. यह आर्टिकल ब्रह्मोस के बनने की पूरी कहानी, लियोनोव का योगदान और इस मिसाइल की उन खूबियों को बताता है जिन्होंने भारत को ग्लोबल लेवल पर एक नई पहचान दी है.
अजेय रफ्तार और रैमजेट तकनीक का राज: अलेक्जेंडर लियोनोव ने ब्रह्मोस को 2.8 मैक की सुपरसोनिक रफ्तार देने के लिए ‘रैमजेट इंजन’ का जो फॉर्मूला तैयार किया, वह आज भी बेजोड़ है. यह तकनीक मिसाइल को हवा से ही ऑक्सीजन खींचकर निरंतर ऊर्जा प्रदान करती है. दुश्मन के रडार और डिफेंस सिस्टम के लिए इतनी तेज गति से आती मिसाइल को ट्रैक करना और रोकना लगभग नामुमकिन है, जो इसे अजेय बनाती है.
एस-मैनुवर: चकमा देने की अद्भुत कला: लियोनोव ने ब्रह्मोस के सॉफ्टवेयर में एक ऐसा गुप्त ‘एस-मैनुवर’ कोड किया था, जो इसे दुनिया की अन्य मिसाइलों से अलग बनाता है. लक्ष्य की ओर बढ़ते समय यह मिसाइल अचानक अपना रास्ता बदल सकती है. दुश्मन की एंटी-मिसाइलें जब तक इसे निशाना बनाने की कोशिश करती हैं, यह अपना पथ बदलकर उन्हें नाकाम कर देती है. यह जटिल फिजिक्स आज भी कई देशों के लिए एक पहेली है.
सी-स्किमिंग: रडार की नजरों से ओझल: लियोनोव ने स्टेल्थ क्षमता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. उनके विजन का ही नतीजा है कि ब्रह्मोस ‘सी-स्किमिंग’ तकनीक के जरिए समुद्र की सतह से महज 10 से 15 मीटर की ऊंचाई पर उड़ सकती है. इतनी कम ऊंचाई पर उड़ने के कारण यह दुश्मन के रडार की लहरों के नीचे बनी रहती है, जिससे लक्ष्य को तबाह होने से पहले हमले का पता तक नहीं चलता.
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पिन-पॉइंट सटीकता और जैम-प्रूफ सिस्टम: अलेक्जेंडर लियोनोव ने ब्रह्मोस में जो गाइडेंस सिस्टम फिट किया, वह पूरी तरह से ‘जैम-प्रूफ’ है. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के दौर में भी दुश्मन इसके सिग्नल्स को ब्लॉक नहीं कर सकता. ‘फायर एंड फॉरगेट’ सिद्धांत पर आधारित यह मिसाइल लॉन्च होने के बाद खुद अपना रास्ता खोजती है और लक्ष्य को पिन-पॉइंट सटीकता के साथ हिट करती है. यह अचूक निशाना लियोनोव की इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा राज है.
यूनिवर्सल लॉन्च प्लेटफॉर्म का विजन: दुनिया में ऐसी बहुत कम मिसाइलें हैं जिन्हें जमीन, समुद्र, सबमरीन और आसमान (जैसे सुखोई-30) चारों प्लेटफॉर्म से दागा जा सके. लियोनोव ने ब्रह्मोस के डिजाइन को इतना लचीला और प्रभावी बनाया कि यह हर मोर्चे पर समान सटीकता से काम करती है. यह ‘यूनिवर्सल’ क्षमता भारत को रणनीतिक बढ़त दिलाती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ब्रह्मोस को एक ग्लोबल ब्रांड के रूप में स्थापित करती है.
हाइपरसोनिक भविष्य की गुप्त रूपरेखा: लियोनोव केवल सुपरसोनिक तक नहीं रुकना चाहते थे. अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने ‘ब्रह्मोस-2’ यानी हाइपरसोनिक वर्जन (7 मैक से ज्यादा रफ्तार) की गुप्त रूपरेखा और डिजाइन तैयार कर लिया था. यह उनकी विरासत का वह हिस्सा है जो भविष्य के युद्धों की परिभाषा बदल देगा. बिना रुके और बिना दिखे हमला करने की यह अगली पीढ़ी की तकनीक लियोनोव के विजन का अंतिम महान अध्याय है.
भारत-रूस दोस्ती और स्वदेशी सॉफ्टवेयर का मेल: लियोनोव का सबसे बड़ा राज उनकी ‘इंजीनियरिंग डिप्लोमेसी’ थी. उन्होंने रूसी हार्डवेयर और भारतीय सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट्स के बीच एक ऐसा संतुलन बनाया, जिसे दुनिया आज एक आदर्श मॉडल मानती है. उन्होंने तकनीक साझा करने में कभी झिझक नहीं दिखाई और भारतीय वैज्ञानिकों को इस काबिल बनाया कि आज भारत हथियारों का निर्यातक बन चुका है. ब्रह्मोस की गर्जना में उनकी यह दोस्ती हमेशा गूंजती रहेगी.