70s का एक ‘साइलेंट सुपरस्टार’, अमिताभ-विनोद की जंग के बीच बनाई अपनी जगह, 1980 में तहस-नहस कर दिया था बॉक्स ऑफिस

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1970 के दशक में जब बॉक्स ऑफिस अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के बीच बंटा हुआ था, तो इसी बीच एक साइलेंट सुपरस्टार उभरने लगा था और वो थे जितेंद्र. 1974 और 1979 के बीच जितेंद्र ने न सिर्फ अपनी रोमांटिक इमेज बदली, बल्कि साउथ इंडियन फिल्ममेकर्स के साथ मिलकर ‘हिट मशीन’ का टाइटल भी हासिल किया. उनकी कड़ी मेहनत और डिसिप्लिन का नतीजा यह हुआ कि 1980 तक वे इंडस्ट्री के सबसे महंगे स्टार्स में से एक बन गए थे. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं जितेंद्र के स्ट्रगल और स्ट्रेटेजी के बारे में, जिसने उन्हें एक महंगे सुपरस्टार में बदल दिया था.

नई दिल्ली. 1970 के दशक के बीच में बॉलीवुड की हवाएं बदल रही थीं. यह बॉलीवुड हिस्ट्री के सबसे दिलचस्प समय में से एक था. अमिताभ बच्चन का जलवा था. जहां अमिताभ बच्चन अपनी ‘एंग्री यंग मैन’ इमेज के साथ देश पर राज कर रहे थे, वहीं विनोद खन्ना अपनी मस्कुलर बॉडी और लुक्स से बच्चन की गद्दी को चैलेंज कर रहे थे. लेकिन इस सब शोर के बीच, सफेद जूतों वाला एक और स्टार चुपचाप अपना एम्पायर बना रहा था और वो थे जितेंद्र. (तस्वीर बनाने में AI की मदद लगी गई है.)

इस बीच राजेश खन्ना का जादू कम हो रहा था. इस समय 60 के दशक से एक्टिव जितेंद्र एक नई पहचान की तलाश में थे. 1974 से 1979 का समय जितेंद्र के लिए लकी साबित हुआ था, जहां उन्होंने साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री के साथ अलायंस किया जिसने बॉलीवुड का लैंडस्केप बदल दिया.

जितेंद्र को शुरू में उनके डांस और सफेद जूतों की वजह से ‘जंपिंग जैक’ कहा जाता था, लेकिन 1974 के बाद उन्होंने अपनी इमेज पर काम करना शुरू कर दिया. ‘बिदाई’ (1974) और ‘खुशबू’ (1975) जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ डांस ही नहीं, बल्कि सीरियस एक्टिंग भी कर सकते हैं. गुलजार जैसे डायरेक्टर्स के साथ काम करके जहां उनकी क्लास दिखी, वहीं उन्होंने ‘धरम वीर’ (1977) जैसी मसाला फिल्मों से भी बड़े पैमाने पर ऑडियंस को अट्रैक्ट किया.

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मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जितेंद्र की सफलता का सबसे बड़ा सीक्रेट साउथ इंडियन प्रोडक्शन हाउस (जैसे पद्मालय स्टूडियोज) के साथ उनका एसोसिएशन था. 1974 से 1979 के बीच, उन्होंने कई ऐसी फिल्मों में काम किया जो सुपरहिट साउथ इंडियन फिल्मों की रीमेक थीं. इन फिल्मों का बजट कम और प्रॉफिट मार्जिन ज्यादा था. जहां अमिताभ बच्चन साल में दो या तीन फिल्में रिलीज कर रहे थे, वहीं जितेंद्र आठ से दस फिल्में रिलीज कर रहे थे. क्वांटिटी और क्वालिटी के इस मेल ने उन्हें डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए सबसे भरोसेमंद एक्टर बना दिया.

साल 1980 जितेंद्र के करियर का टर्निंग प्वाइंट था. इस साल उनकी फिल्म ‘आशा’ रिलीज हुई, जिसने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया. इस दौरान, विनोद खन्ना ने ओशो की शरण लेने का फैसला किया और फिल्मों से रिटायरमेंट ले लिया. विनोद खन्ना के जाने से जो खालीपन आया, उसे जितेंद्र ने भरा. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो 1980 के आस-पास जितेंद्र की मार्केट वैल्यू इतनी बढ़ गई थी कि वे फीस के मामले में अमिताभ बच्चन को टक्कर देने लगे थे. वे कई प्रोजेक्ट्स के लिए उस समय के सबसे महंगे एक्टर बन गए, क्योंकि उनकी फिल्मों में 100% रिकवरी की गारंटी होती थी.

कहा जाता है कि जितेंद्र की सबसे बड़ी ताकत उनका डिसिप्लिन था. वह सुबह जल्दी सेट पर आ जाते थे और दिन में दो शिफ्ट में काम करते थे. यही वजह थी कि 1980 के दशक की शुरुआत तक उनके पास फिल्मों का बैकलॉग था. ‘स्वर्ग नरक’, ‘ज्योति बने ज्वाला’ और ‘जुदाई’ जैसी फिल्मों ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया.

उस दौर में अमिताभ बच्चन भले ही नंबर 1 थे, लेकिन जितेंद्र वह सुपरस्टार थे जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से एक पैरेलल पावर बनाई थी. 1974 से 1979 तक उन्होंने जो नींव रखी, उसका फल 1980 में मिला, जब वह फीस और डिमांड के मामले में पीक पर पहुंच गए.

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