Thiruvarppu Sreekrishna Swami Temple yahan shri krishna ka din mein 10 baar lagta hai bhog | यहां हमारे कान्हा का दिन में लगता है 10 बार भोग, देर होने

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यहां हमारे कान्हा का दिन में लगता है 10 बार भोग, ग्रहण पर नहीं बंद होते कपाट

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Thiruvarppu Sreekrishna Swami Temple: भगवान श्रीकृष्ण के आपने कई मंदिरों के दर्शन किए होंगे लेकिन एक मंदिर ऐसा है, जहां भगवान का 10 बार भोग लगाया जाता है. अगर भोग लगाने में देरी हो जाती है तो प्रतिमा कमजोर हो जाती है. भोग लगने में कोई परेशानी ना हो इसलिए ग्रहण के समय भी पट बंद नहीं किए जाते हैं. मान्यता है कि यहां दर्शन करने मात्र से भक्त की सभी इच्छाएं पूरी हो जाती है. आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण के इस मंदिर के बारे में…

यहां हमारे कान्हा का दिन में लगता है 10 बार भोग, ग्रहण पर नहीं बंद होते कपाटZoom

Thiruvarppu Sreekrishna Swami Temple: देशभर में कई प्राचीन मंदिर हैं, जहां भगवान श्री कृष्ण अलग-अलग अवतारों में भक्तों के कष्टों को हरते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि केरल की धरती पर ऐसा मंदिर मौजूद है, जो साल के 365 दिन दर्शन के लिए खुला रहता है और ग्रहण लगने पर भी मंदिर में पूजा-पाठ बंद नहीं होता. हम बात कर रहे हैं केरल के तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर की. मान्यता है कि यहां श्रीकृष्ण के दर्शन करने मात्र से सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और हर कष्ट से मुक्ति मिलती है. साथ ही दिन में 10 बार भोग भी लगाया जाता है. अगर भोग लगाने में देरी हो जाती है तो प्रतिमा कमजोर हो जाती है. आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण के इस मंदिर के बारे में…

10 बार लगता है भोग
थिरुवरप्पु बस स्टैंड के पास स्थित तिरुवरप्पु श्री कृष्ण मंदिर को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रसिद्ध हैं. यह पहला मंदिर है, जहां भगवान श्रीकृष्ण को दिन में 10 बार भोग अर्पित किया जाता है, और अगर भोग अर्पित करने में देरी होती है, तो भगवान की प्रतिमा पतली हो जाती है और कमर पर बंधा कमरबंध भी अपनी जगह से खिसकने लगता है. यही कारण है कि ग्रहण के समय भी भगवान को लगातार भोग लगता रहता है.

ग्रहण में भी खुले रहते हैं कपाट
स्थानीय लोक मान्यताओं की मानें तो एक बार ग्रहण की वजह से मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए थे और अगले दिन सुबह जब मंदिर के कपाट खोले गए तो भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा एक दिन में ही कमजोर दिखने लगी थी और कमरबंध कमर से नीचे खिसक गया था. तब से लेकर अब तक मंदिर को रात को नौ बजे बंद किया जाता है और सुबह 2 बजे खोल दिया जाता है. भगवान को पहला भोग सुबह 3 बजे अर्पित किया जाता है.

मंदिर में कुल्हाड़ी रखने की परंपरा
मंदिर में कुल्हाड़ी रखने की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है. कुल्हाड़ी रखने के पीछे का कारण है कि अगर मंदिर और गर्भगृह के ताले किसी कारणवश नहीं खुल पाते हैं, तो कुल्हाड़ी की सहायता से ताले और दरवाजे को तोड़ा जा सके. गर्भगृह में मौजूद कृष्ण जी की प्रतिमा भी बहुत खास है, जो काले रंग की है और पीले वस्त्रों और आभूषणों से उनका शृंगार किया गया है. प्रतिमा की चार भुजाएं हैं, जो शंख और अस्त्र धारण किए हुए हैं.

कंस का वध करने के बाद यहां आए थे कृष्णजी
माना जाता है कि यह स्वंयभू प्रतिमा पांडवों को मिली थी, जिसे उन्होंने एक संत को स्थापित करने के लिए दिया था. यह प्रतिमा भगवान के उस रूप को दिखाती है, जब उन्होंने कंस का वध किया था. कंस का वध करने के बाद श्री कृष्ण को बहुत तेज भूख लगी थी और अपनी भूख को शांत करने के लिए वे इसी स्थल पर आए थे. मंदिर के परांगण में अन्य मंदिर भी मौजूद हैं. परिसर में कोचंबलम मंदिर, शिव मंदिर, गणपति, सुबरमणियार और सास्ता के मंदिर भी मौजूद हैं.

About the Author

Parag Sharma

पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें



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