Madras High Court | HC Big Judgment | Temple Donation Order – मंद‍िर पेट‍ियों पर जमा पैसा मंदिर का संसाधन है, न कि पुजारियों की निजी जागीर, हाईकोर्ट न

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नई द‍िल्‍ली.मंदिरों की दान पेटियों (हुंडी) में जमा होने वाले पैसे को लेकर लंबे समय से चल रही बहस पर मद्रास हाईकोर्ट ने बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है.हाईकोर्ट ने कहा है कि मंदिर में चढ़ावा या दान के रूप में जमा होने वाला पैसा किसी पुजारी या परिवार की निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि यह भक्तों के सामूहिक विश्वास से जुड़ा सार्वजनिक ट्रस्ट है.

जस्टिस जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस के.के.रामकृष्णन की बेंच ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि धर्म का इस्तेमाल दौलत कमाने के ज़रिया के तौर पर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दान पेट‍ियों में जमा पैसा पुजारियों की निजी जागीर नहीं है बल्कि यह समाज और भक्तों के हित में इस्तेमाल होने वाला संसाधन है.

क्या था मामला?
यह मामला मदुरै के अरुलमिघु पांडी मुनीश्वर मंदिर से जुड़ा है,जहां कुछ लोगों ने खुद को वंशानुगत पुजारी और ट्रस्टी बताते हुए मंदिर प्रशासन और दान पर अधिकार का दावा किया था. याचिकाकर्ताओं ने तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 54(1) का हवाला देते हुए कहा किउन्हें वंशानुगत ट्रस्टी के तौर पर मान्यता मिलनी चाहिए. मंदिर के प्रशासन पर उनका अधिकार है और सरकार का एचआर एंड सीई विभाग इसमें दखल नहीं दे सकता है.

राज्य सरकार का क्‍या था कहना?
राज्य सरकार ने इन दावों का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं को कभी वैध रूप से ट्रस्टी नियुक्त नहीं किया गया. उन्होंने खुद को ट्रस्टी घोषित करने की कोशिश की. मंदिर के दान में गड़बड़ी और हेराफेरी की शिकायतें भी सामने आईं. सरकार ने यह भी बताया कि अदालत के निर्देश पर एचआर एंड सीई विभाग ने हस्तक्षेप कर आवश्यक कदम उठाए और कुछ लोगों को ट्रस्टी पद से हटाया.

कोर्ट ने क्या पाया?
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि वंशानुगत ट्रस्टी होने का कोई ठोस दस्तावेज़ी सबूत नहीं दिया गया. ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि मंदिर किसी विशेष ‘आगम’ पर चलता है जिसमें वंशानुगत पुजारीशिप अनिवार्य हो याचिकाकर्ताओं का दावा कानूनी रूप से कमजोर है. इसके आधार पर कोर्ट ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता वंशानुगत पुजारी या ट्रस्टी बनने के हकदार नहीं हैं.

दान पेटी पर कोर्ट का बड़ा संदेश
हाईकोर्ट फैसले का सबसे अहम हिस्सा वह था, जिसमें कोर्ट ने दान पेटी के पैसे को लेकर स्पष्ट रुख अपनाया. कोर्ट ने कहा क‍ि यह पैसा किसी एक व्यक्ति या परिवार का नहीं है. यह ‘ट्रस्ट’ के रूप में समाज के लिए रखा गया है. इसका उपयोग मंदिर और भक्तों के कल्याण के लिए होना चाहिए.

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुजारियों को सेवा के बदले पारिश्रमिक मिल सकता है, लेकिन इससे उन्हें दान की राशि पर मालिकाना हक नहीं मिल जाता. हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी जिक्र किया. खासतौर पर श्री जगन्नाथ मंदिर पुरी प्रबंधन समिति बनाम चिंतामणि खुंटिया केस का. इसमें भी सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि पुजारियों को हुंडी के पैसे में हिस्सेदारी मांगने का कोई अधिकार नहीं है.

‘धर्म को कमाई का जरिया नहीं बना सकते’
हाईकोर्ट की सबसे सख्त टिप्पणी यह रही कि धर्म और धार्मिकता का इस्तेमाल पैसे कमाने के लिए नहीं किया जा सकता. इस टिप्पणी को न्यायपालिका का एक मजबूत संदेश माना जा रहा है, जो धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर है.

सरकार की भूमिका क्यों जरूरी?
कोर्ट ने यह भी माना कि मंदिर में भारी दान आता है. ऐसे में वित्तीय पारदर्शिता जरूरी है और अगर गड़बड़ी की आशंका हो तो सरकार का दखल जरूरी हो जाता है. इसी आधार पर कोर्ट ने एचआर एंड सीई विभाग की कार्रवाई को सही ठहराया और कहा कि मंदिर प्रशासन को नियमों के तहत संचालित किया जाना चाहिए.

ऑर्डर में कोर्ट ने क्‍या कहा?
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि ट्रस्टियों को हटाने से जुड़ी लंबित कार्यवाही पर 4 सप्ताह में फैसला लिया जाए और जरूरत पड़े तो मंदिर प्रशासन को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लिया जाए.

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