नक्सलियों का रेड कॉरिडोर बना इतिहास, माओवादी हुए पस्त; कश्मीर में आतंकवाद का इकोसिस्टम भी पूरी तरह ध्वस्त

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नई दिल्ली. भारत में पिछले 12 वर्षों के दौरान दो प्रमुख आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों – वामपंथी उग्रवाद और जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है. लगातार सुरक्षा अभियानों, बेहतर खुफिया समन्वय और विकास आधारित हस्तक्षेपों ने इस गिरावट में निर्णायक भूमिका निभाई है. ‘द संडे गार्जियन’ में प्रकाशित रिपोर्ट में नक्सलवाद के मोर्चे पर माओवादी समूहों के भौगोलिक विस्तार और परिचालन क्षमताओं दोनों में भारी कमी आने की बात कही गई है.

रिपोर्ट के अनुसार, नक्सलवाद के मोर्चे पर माओवादी संगठनों के भौगोलिक विस्तार और ऑपरेशनल क्षमता में तेज गिरावट आई है. पहले मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से में फैला रेड कॉरिडोर अब सिमटकर कुछ जिलों तक सीमित रह गया है.

सुरक्षाबलों ने वर्षों में कई शीर्ष माओवादी नेताओं को निष्क्रिय किया, उनके लॉजिस्टिक नेटवर्क को ध्वस्त किया और सप्लाई लाइनों को बाधित किया, जिससे उनकी गतिविधियों पर बड़ा असर पड़ा. रणनीति में बदलाव और इलाके पर कब्जे से हटकर खुफिया आधारित टारगेटेड ऑपरेशंस इस सफलता का अहम कारण रहा है. तकनीक के बढ़ते उपयोग, राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के बेहतर समन्वय और दूरदराज इलाकों में मजबूत सुरक्षा कैंप स्थापित करने से माओवादी कैडर की गतिशीलता और हमले की क्षमता काफी कम हुई है.

सरकार द्वारा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास पर जोर भी निर्णायक साबित हुआ है. सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी, बैंकिंग और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार से दूरदराज के आदिवासी इलाकों का मुख्यधारा से जुड़ाव बढ़ा है, जिससे माओवादी संगठनों का आधार कमजोर हुआ है. आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियों ने भी कई कैडरों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया है.

वहीं जम्मू-कश्मीर में भी पिछले दशक में उग्रवाद कमजोर हुआ है. सेना, अर्धसैनिक बलों और स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर समन्वय से आतंकवाद विरोधी अभियान अधिक प्रभावी और सटीक हुए हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि आतंक के पूरे इकोसिस्टम, ओवरग्राउंड वर्कर नेटवर्क, फंडिंग चैनल और भर्ती तंत्र, को तोड़ने पर खास ध्यान दिया गया. निगरानी और कार्रवाई बढ़ने से आतंकी संगठनों के लिए संचालन और नए लोगों को जोड़ना मुश्किल हो गया है. सीमा प्रबंधन, फेंसिंग और आधुनिक निगरानी तकनीकों के कारण घुसपैठ में भी काफी कमी आई है, जिससे पाकिस्तान समर्थित समूहों की क्षमता प्रभावित हुई है.

हालांकि पहले स्थानीय भर्ती चिंता का विषय थी, लेकिन लगातार दबाव और जनसंपर्क पहल के चलते इसमें भी गिरावट आई है. टारगेटेड ऑपरेशंस ने सक्रिय आतंकियों की लाइफस्पैन कम कर दी है, जिससे उनके हमलों की क्षमता सीमित हुई है.

इन सभी उपायों के संयुक्त प्रभाव से बड़े हमलों में कमी आई है और क्षेत्र में स्थिरता बढ़ी है. नागरिक जीवन, पर्यटन और स्थानीय प्रशासन में सुधार के संकेत मिले हैं, हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि छिटपुट घटनाएं और खतरे अब भी बने हुए हैं. अभिनंदन मिश्रा द्वारा तैयार रिपोर्ट के मुताबिक सख्त सुरक्षा उपायों के साथ विकास और सुशासन को जोड़ने वाली रणनीति ने नक्सलवाद और कश्मीर में उग्रवाद दोनों में गिरावट लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

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