एपिस मेलिफेरा या डोरसाटा…जानिए पालन के लिए कौन सी मधुमक्खी बेस्ट, बी वेनम की कीमत ही ₹20 लाख किलो
अलीगढ़. कम जमीन वाले किसानों के लिए खेती में अच्छा मुनाफा कमाना एक चुनौती हो सकता है, लेकिन अगर सही विकल्प चुना जाए तो कम लागत में भी बेहतर आय प्राप्त की जा सकती है. ऐसे ही एक प्रभावी और लाभकारी विकल्प के रूप में मधुमक्खी पालन तेजी से उभर रहा है. यह न केवल कम जगह में किया जा सकता है, बल्कि इससे सीधे बाजार से जुड़कर अच्छी आमदनी भी हासिल होती है. अलीगढ़ उद्यान विभाग के उप निदेशक बलजीत सिंह बताते हैं कि मधुमक्खी पालन एक व्यवहारिक और वैज्ञानिक पद्धति है, जिसमें विभिन्न प्रकार की मधुमक्खियां पाली जाती हैं, जैसे एपिस मेलिफेरा (इटालियन/यूरोपियन मधुमक्खी), एपिस सेराना (भारतीय), डोरसाटा (बड़ी और आक्रामक) और फ्लोरिया (छोटी प्रजाति).
इनमें से एपिस मेलिफेरा को व्यावसायिक रूप से सबसे अधिक अपनाया गया है, क्योंकि यह तेजी से शहद उत्पादन करती है. एक छत्ते से लगभग 15 से 20 किलो तक शहद प्राप्त किया जा सकता है. यदि कोई किसान 100 छत्तों के साथ काम करता है, तो वह सालभर में लगभग 1500 किलो शहद का उत्पादन कर सकता है. यदि शहद का औसत मूल्य ₹200 प्रति किलो माना जाए, तो किसान को लगभग ₹3 लाख तक की आय हो सकती है. शुद्ध और ब्रांडेड शहद ₹500 प्रति किलो तक बिक सकता है, जिससे मुनाफा और बढ़ जाता है.
हर हिस्से से मुनाफा
बलजीत सिंह के मुताबिक, मधुमक्खी पालन का एक बड़ा लाभ यह भी है कि यह फसलों की उपज को 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ा देता है. इसका कारण है परागण (पॉलिनेशन), जिससे फल और बीज बनने की प्रक्रिया बेहतर होती है. सरसों, आम, लीची, जामुन जैसी फूल वाली फसलों में इसका विशेष लाभ देखने को मिलता है. इस क्षेत्र में केवल शहद ही नहीं, बल्कि कई अन्य उत्पादों से भी आय होती है, जैसे रॉयल जेली, मधुमक्खी का जहर (बी वेनम), मोम (वैक्स) और रानी मधुमक्खी (क्वीन बी) का उत्पादन. रॉयल जेली की कीमत 2-3 लाख रुपये प्रति लीटर तक हो सकती है, जबकि बी वेनम की कीमत 10 से 20 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है. अच्छी क्वालिटी की रानी मधुमक्खी ₹200 से लेकर ₹5000 तक में बेची जा सकती है.
इन पेड़ों के पास लगाने में फायदा
बलजीत सिंह बताते हैं कि सरकार भी किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. मिशन ऑन इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) योजना के तहत मधुमक्खी पालन यूनिट लगाने पर 40 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है. यदि कोई किसान 10 लाख रुपये तक का प्रोजेक्ट लगाता है, तो उसे 4 लाख रुपये तक की सहायता मिल सकती है. शहद निकालने के उपकरण, मास्क, ग्लव्स आदि पर भी सब्सिडी उपलब्ध है. कोविड के बाद शहद की मांग तेजी से बढ़ी है. शुद्ध शहद की पहचान होने पर ग्राहक अधिक कीमत देने को भी तैयार रहते हैं. बलजीत सिंह के मुताबिक, कई किसान अपने छत्तों को विशेष पेड़ों जैसे यूकेलिप्टस, आम, लीची या नीम के पास रखते हैं, जिससे शहद में विशेष स्वाद और गुण आ जाते हैं और उसकी बाजार में कीमत भी अधिक मिलती है.