समय की कीमत मीटर में दर्ज नहीं होती, पहिया पंप पर ही रुक जाए तो आय सिकुड़ना तय! CNG पंपों पर जद्दोजहद

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Darbhanga CNG Crisis: दरभंगा शहर में सीमित सीएनजी पंप होने के कारण रोजाना लंबी कतारें लग रही हैं, जिससे चालकों का कीमती समय बर्बाद हो रहा है. घंटों इंतजार के बावजूद कई बार उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है. ऐसे में सवाल उठता है कि जब मांग बढ़ रही है, तो क्या सुविधाएं भी उसी गति से बढ़ रही हैं, या फिर यह व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है.

दरभंगा. पर्यावरण-अनुकूल सीएनजी ऑटो को सरकार और बाजार दोनों का समर्थन तो मिला, लेकिन जमीनी स्तर पर सुविधाएं उसी गति से विकसित नहीं हो पाईं. शहर में फिलहाल केवल दो पंप-दिल्ली मोड़ और एकमी-शोभन बाईपास-ही संचालित हो रहे हैं, जिसका असर रोजमर्रा की स्थिति में साफ दिखाई देता है. सुबह से ही ऑटो की लंबी कतारें लग जाती हैं, जो दोपहर तक जस की तस बनी रहती हैं और शाम तक भी इंतजार खत्म नहीं होता. चालकों का अनुभव भी लगभग एक जैसा है-तीन से पांच घंटे तक लाइन में खड़ा रहना सामान्य बात हो गई है. कई बार तो उन्हें यह भी सुनना पड़ता है कि गैस खत्म हो गई है और अब आपूर्ति बाद में आएगी. सीएनजी की कीमत भले ही 94.50 रुपये प्रति किलो हो, लेकिन चालक जो समय की कीमत चुका रहे हैं, वह किसी मीटर में दर्ज नहीं होती.

आजमगढ़ मोहल्ले के जितेंद्र शाह कहते हैं कि लाइन में लगना अब दिनचर्या बन गया है. एक बार में चार-पांच घंटे निकलते हैं. कई दिन तो बारी न आने पर भी खाली लौटना पड़ता है. इस नुकसान की भरपाई के लिए अतिरिक्त फेरे लगाने पड़ते हैं, जो बचत नहीं होने देता. सिंघवारा-भरवाड़ा से आए जयकांत महतो 26 किलोमीटर दूर से CNG भरवाने आते हैं. उनका कहना है कि घर चलाने के लिए जो कमाना है, वह गैस भरवाने की प्रतीक्षा में खर्च हो जाता है. ऐसे कई चालक हैं जिनकी रोजी-रोटी इसी पहिए पर चलती है. जब पहिया पंप पर ही रुक जाए तो आय सिकुड़ना तय है.

कमाई पर पड़ रहा काफी असर
यह दृश्य केवल एक पंप तक सीमित नहीं. दिल्ली मोड़ और शोभन बाईपास- दोनों जगहों पर फर्क बस कतार की लंबाई का है, परेशानी समान है. आस पास के प्रखंडों से भी वाहन खिंचे चले आते हैं, 25-30 किमी का सफर आम है. इस भीड़ का सीधा असर चालकों की कमाई पर पड़ता है.

कम फेरे, कम सवारियां और ईंधन भरवाने में लगा समय
कई चालक यह सवाल उठाते हैं कि जब जिले में बेतहाशा सीएनजी गाड़ियां बिक रही हैं, तब आपूर्ति-बुनियाद- पंप की संख्या, डिस्पेंसर, दबाव-प्रबंधन, और समय-सारणी- उतनी क्यों नहीं बढ़ी. विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वच्छ ईंधन अपनाना टिकाऊ तभी होगा जब रोजमर्रा की सुविधा भरोसेमंद हो. पंपों की संख्या बढ़े, डिस्पेंसर के पॉइंट सुधरें, और पीक-आवर्स में प्रबंधन बेहतर हो तो कतारें घटेंगी और चालकों को काम का समय मिलेगा. फिलहाल तस्वीर यही है कि ईंधन भरवाना ऑटो-चालकों के लिए परिश्रमी पड़ाव बन गया है. वे चाहते हैं, जैसे गाड़ियां बढ़ीं, वैसे पंप और सिस्टम भी बढ़ें, ताकि कमाई का पहिया फिर से चले, और परिवार आसानी से चल सके.

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Mohd Majid

with more than more than 5 years of experience in journalism. It has been two and half year to associated with Network 18 Since 2023. Currently Working as a Senior content Editor at Network 18. Here, I am cover…और पढ़ें

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