ड्रैगन की दादागिरी खत्म कर देगा यह ‘पावर गेम’! कनाडा और ब्राजील के साथ भारत ने चली चीन के खिलाफ सबसे बड़ी चाल
नई दिल्ली: चीन ने लंबे समय से दुनिया के रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स मार्केट पर अपना कब्जा जमाया हुआ है. अब भारत ने इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए कमर कस ली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा और ब्राजील के साथ मिलकर रणनीतिक साझेदारियां की हैं, जो भारत की चीन पर निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर देंगी. कनाडा के साथ हुआ 2.6 बिलियन डॉलर का यूरेनियम और मिनरल सौदा न केवल ऊर्जा बल्कि डिफेंस सेक्टर को भी नई मजबूती देगा. चीन फिलहाल दुनिया की 92% रिफाइनिंग कंट्रोल करता है, लेकिन भारत का यह कदम वैश्विक राजनीति में पावर शिफ्ट की शुरुआत है. बजट 2026-27 में ‘डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर’ और 7,280 करोड़ रुपये की योजना से भारत अब खुद मैग्नेट और एलॉय बनाने की दिशा में बढ़ रहा है. यह रणनीति भारत को रक्षा और ग्रीन टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनाएगी.
क्या कनाडा और ब्राजील के साथ हुए नए समझौते चीन का तिलिस्म तोड़ पाएंगे?
$2.6 बिलियन का यूरेनियम सौदा केवल ईंधन की आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्मॉल मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर्स और एडवांस रिएक्टर्स के निर्माण में भी सहयोग करेगा. कनाडा के पास दुनिया के सबसे बड़े रेयर अर्थ संसाधनों में से एक है, जिसका अनुमान 15.2 मिलियन टन से अधिक है.
क्या पीएम मोदी का नया मास्टरप्लान तोड़ेगा ड्रैगन का तिलिस्म? (Illustration : Reuters)
रेयर अर्थ एलिमेंट्स आखिर आधुनिक इंडस्ट्री के लिए ‘विटामिन्स’ क्यों कहे जाते हैं?
- इनका उपयोग स्मार्टफोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की मोटरों और विंड टर्बाइन के लिए स्थायी चुंबक (Permanent Magnets) बनाने में होता है.
- उदाहरण के तौर पर, नियोडिमियम का उपयोग शक्तिशाली चुंबक बनाने में होता है, जबकि यूरोपियम स्क्रीन के रंगों को जीवंत बनाता है.
- इनके बिना हाई-टेक और ग्रीन टेक्नोलॉजी की कल्पना करना भी मुश्किल है. इनका कोई आसान विकल्प नहीं है, इसलिए ये दुनिया के लिए बेहद कीमती बन गए हैं.
डिफेंस और नेशनल सिक्योरिटी के लिए ये मिनरल्स कितने जरूरी हैं?
रक्षा क्षेत्र में रेयर अर्थ एलिमेंट्स की भूमिका किसी भी देश की ताकत तय करती है. गाइडेड मिसाइल, रडार और स्टील्थ टेक्नोलॉजी पूरी तरह से इन पर निर्भर है.
आंकड़े बताते हैं कि एक लॉकहीड मार्टिन F-35 फाइटर जेट को बनाने में लगभग 420 किलोग्राम से ज्यादा रेयर अर्थ की जरूरत होती है. वहीं, एक वर्जीनिया क्लास की पनडुब्बी (Submarine) को बनाने में 4,500 किलोग्राम से अधिक इन धातुओं का इस्तेमाल होता है.
दुर्लभ मृदा खनिजों- सीरियम ऑक्साइड, बैस्टनेसाइट, नियोडाइमियम ऑक्साइड और लैंथेनम कार्बोनेट के नमूने. (फाइल फोटो : रॉयटर्स)
गोल्डमैन सैक्स की 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर रेयर अर्थ की सप्लाई में 10% की भी बाधा आती है, तो वैश्विक उत्पादन में $150 बिलियन की गिरावट आ सकती है. यही वजह है कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अब आत्मनिर्भर बनने पर जोर दे रहा है.
भारत के पास भारी भंडार होने के बावजूद उत्पादन कम क्यों है?
इसके अलावा, माइनिंग परमिट हासिल करना और पर्यावरण संबंधी मंजूरियों में लंबा समय लगता है. सरकारी कंपनी इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड (IREL) को रिफाइनिंग की सुविधा तो है, लेकिन हमारे पास मैग्नेट और एलॉय (मिश्र धातु) बनाने वाली बड़े स्तर की यूनिट्स की कमी रही है. एक पूरी सप्लाई चेन तैयार करने में लगभग एक दशक का समय और भारी निवेश की जरूरत होती है. हालांकि, अब सरकार निजी क्षेत्र को इसमें शामिल करके इस बाधा को दूर कर रही है.
बजट 2026-27 के ‘डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर’ से क्या बदलेगा?
- भारत सरकार ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए बजट 2026-27 में ‘डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर्स‘ की घोषणा की है. ये कॉरिडोर ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में बनाए जाएंगे.
- इनका मुख्य उद्देश्य माइनिंग, प्रोसेसिंग और रिसर्च को एक ही नेटवर्क से जोड़ना है. सरकार ने रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) निर्माण के लिए ₹7,280 करोड़ की एक महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दी है.
- इस योजना के तहत अगले पांच वर्षों में ₹6,450 करोड़ के सेल्स-लिंक्ड इंसेंटिव और ₹750 करोड़ की कैपिटल सब्सिडी दी जाएगी.
- लक्ष्य यह है कि भारत अपनी रेयर अर्थ मैग्नेट की चीन पर 80-90% निर्भरता को खत्म कर सके.
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने पहले ही 482.6 मिलियन टन रेयर अर्थ ओर संसाधनों की पहचान कर ली है, जो भारत के भविष्य के लिए एक मजबूत आधार है.
चीन की ‘एक्सपोर्ट कंट्रोल’ की नीति का मुकाबला भारत कैसे करेगा?
अप्रैल 2025 से चीन ने सैमेरियम सहित सात प्रकार की रेयर अर्थ धातुओं पर सख्त निर्यात नियंत्रण लागू कर दिया है. सैमेरियम का उपयोग गर्मी प्रतिरोधी मैग्नेट बनाने में होता है, जो एयरोस्पेस और डिफेंस के लिए बेहद जरूरी है. चीन ने यह कदम तब उठाया है जब पश्चिमी देश यूक्रेन और गाजा संकट के कारण अपने सैन्य संसाधनों पर दबाव महसूस कर रहे हैं.
शेनझेन में चाइना रेयर अर्थ ग्रुप कंपनी का ऑफिस. (फाइल फोटो : रॉयटर्स)
भारत इस चुनौती का जवाब देने के लिए ‘क्वाड’ (Quad) देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है और खनिजों के लिए नए वैश्विक गठबंधन बना रहा है. भारत की ‘काबिल’ (KABIL) जैसी कंपनियां विदेशों में खनिज संपदा खरीदने पर ध्यान दे रही हैं.
साथ ही, देश के भीतर ओड़िशा सैंड्स कॉम्प्लेक्स (OSCOM) जैसेFlagship यूनिट्स की क्षमता बढ़ाई जा रही है. भोपाल में एक ‘रेयर अर्थ एंड टाइटेनियम थीम पार्क’ बनाने का भी प्रस्ताव है, जो नई तकनीकों के व्यवसायीकरण में मदद करेगा.
आत्मनिर्भर भारत के लिए रेयर अर्थ सेक्टर में अगला कदम क्या होना चाहिए?
भारत अब केवल कच्चा माल निकालने तक सीमित नहीं रहना चाहता. वेदांता ग्रुप, जेएसडब्ल्यू और महिंद्रा जैसी बड़ी निजी कंपनियां अब इस इकोसिस्टम में दिलचस्पी ले रही हैं. ट्राफलगर इंजीनियरिंग ने भारत के पहले एकीकृत प्लांट की योजना बनाई है, जो मेटल, एलॉय और मैग्नेट तीनों तैयार करेगा.
रणनीतिक रूप से भारत को अब जापान और अमेरिका की तरह अपना ‘नेशनल स्टॉकपाइल’ (खनिज भंडार) बनाना होगा ताकि किसी भी वैश्विक संकट के समय सप्लाई बाधित न हो.
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी जल्दी अपनी खनिज संपदा को राष्ट्रीय शक्ति में बदल पाता है. रेयर अर्थ का मुद्दा अब सिर्फ एक व्यापारिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है.
जिस तरह से भारत ने रणनीतिक कच्चे तेल के भंडार बनाए हैं, उसी तर्ज पर क्रिटिकल मिनरल्स के लिए भी एक मजबूत आर्किटेक्चर तैयार करना समय की मांग है.