Kumaoni Recipe: हल्की, हेल्दी और टेस्टी… ये झोली बच्चों से बुजुर्ग तक सभी को भाएगी, जानिए आसान रेसिपी

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उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति में प्याज के पत्तों की झोली एक बेहद लोकप्रिय व्यंजन है. यह हल्की, स्वादिष्ट और सेहतमंद कढ़ी छाछ, बेसन और ताजे हरे प्याज के पत्तों से बनती है. सर्दियों और बरसात में इसे शरीर को गर्म रखने और पाचन सुधारने के लिए रोजमर्रा के भोजन में शामिल किया जाता है.

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में बनने वाली प्याज के पत्तों की झोली एक बेहद लोकप्रिय व्यंजन है. यह मुख्य रूप से छाछ और बेसन से बनाई जाने वाली कढ़ी है, जिसमें ताजे हरे प्याज के पत्तों का यूज किया जाता है. पहाड़ी घरों में यह डिश खासकर सर्दियों और बरसात के मौसम में बनाई जाती है, क्योंकि यह शरीर को गर्माहट देने के साथ पाचन में भी मदद करती है. इसका स्वाद हल्का खट्टा, थोड़ा तीखा और बहुत ही ताजगी भरा होता है. ग्रामीण इलाकों में आज भी इसे लकड़ी के चूल्हे पर पकाया जाता है, जिससे इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है.

स्थानीय जानकार सुनीता टम्टा ने लोकल 18 को बताया कि प्याज के पत्तों की झोली में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पूरी तरह से प्राकृतिक और सेहतमंद होती है. इसमें हरे प्याज के पत्ते, बेसन, छाछ या दही, हल्दी, जीरा, हींग और हल्के मसाले शामिल होते हैं. हरे प्याज के पत्तों में विटामिन A, C और आयरन भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. वहीं, छाछ पाचन के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है. बेसन प्रोटीन का अच्छा स्रोत होता है. इस तरह यह डिश स्वाद के साथ-साथ शरीर को जरूरी पोषण भी देती है. यही कारण है कि पहाड़ी लोग इसे रोजमर्रा के खाने में भी शामिल करते हैं.

इस डिश को बनाने के लिए सबसे पहले हरे प्याज के पत्तों को अच्छे से धोकर बारीक काट लिया जाता है. इसके बाद कढ़ाही में घी या तेल गर्म किया जाता है, उसमें जीरा व हींग का तड़का लगाया जाता है. फिर कटे हुए प्याज के सफेद और हरे हिस्से को हल्का भून लिया जाता है. दूसरी ओर एक बर्तन में बेसन, छाछ या दही, हल्दी और मसाले डालकर एक स्मूद घोल तैयार किया जाता है. इस घोल को कढ़ाही में डालकर धीमी आंच पर लगातार चलाते हुए पकाया जाता है ताकि गांठ न बने. धीरे-धीरे यह गाढ़ी होकर झोली का रूप ले लेती है.

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प्याज के पत्तों की झोली का स्वाद बेहद संतुलित और अनोखा होता है. इसमें छाछ की हल्की खटास, मसालों की सौम्य तीखापन और हरे प्याज की ताजगी का बेहतरीन मेल होता है. यह न तो बहुत ज्यादा मसालेदार होती है और न ही बहुत साधारण, बल्कि इसका स्वाद बिल्कुल संतुलित रहता है. जब इसे गरमागरम चावल के साथ खाया जाता है, तो इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है. पहाड़ों में इसे कंफर्ट फूड के रूप में देखा जाता है, जो हल्का होने के साथ पेट भरने वाला भी होता है. खासकर ठंड के मौसम में इसका स्वाद और भी ज्यादा पसंद किया जाता है.

प्याज के पत्तों की झोली को आमतौर पर गरम-गरम चावल के साथ परोसा जाता है. कुछ लोग इसे मंडुवे की रोटी या गेहूं की रोटी के साथ भी खाते हैं. पहाड़ी घरों में इसे लकड़ी के चूल्हे पर पकाकर सीधे परोसा जाता है, जिससे इसका स्वाद और खुशबू दोनों बढ़ जाते हैं. कई जगहों पर इसके साथ मूली का सलाद या हरी मिर्च भी परोसी जाती है. यह एक ऐसा व्यंजन है, जिसे बहुत ज्यादा सजावट की जरूरत नहीं होती है, बल्कि इसकी सादगी ही इसकी पहचान है. घर के बने घी के साथ खाने पर इसका स्वाद और भी लाजवाब हो जाता है.

यह डिश खासतौर पर ठंड और बरसात के मौसम में बनाई जाती है, क्योंकि उस समय हरे प्याज के पत्ते आसानी से उपलब्ध होते हैं. साथ ही, यह शरीर को अंदर से गर्म रखने में मदद करती है. पहाड़ों में मौसम के अनुसार भोजन बनाने की परंपरा है, झोली इसका एक अच्छा उदाहरण है. यह हल्की होने के कारण पचने में आसान होती है, इसलिए इसे बीमार व्यक्ति को भी दिया जाता है. मौसम के अनुसार शरीर को संतुलित रखने में यह डिश महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यही कारण है कि यह पारंपरिक भोजन आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है.

प्याज के पत्तों की झोली कई तरह से स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है. इसमें मौजूद छाछ पाचन तंत्र को मजबूत बनाती है, गैस या एसिडिटी की समस्या को कम करती है. हरे प्याज के पत्ते शरीर में खून की कमी को दूर करने में मदद करते हैं. बेसन प्रोटीन का अच्छा स्रोत होता है, जिससे शरीर को ऊर्जा मिलती है. इसमें इस्तेमाल होने वाले मसाले जैसे जीरा और हींग पाचन को बेहतर बनाते हैं. यह डिश हल्की होने के कारण वजन नियंत्रित रखने में भी सहायक मानी जाती है. इस तरह यह स्वाद के साथ-साथ एक हेल्दी विकल्प भी है.

प्याज के पत्तों की झोली सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है. यह पीढ़ियों से बनती आ रही रेसिपी है, जिसे आज भी लोग उसी पारंपरिक तरीके से बनाना पसंद करते हैं. गांवों में यह रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा है और खास मौकों पर भी बनाई जाती है. आधुनिक खानपान के दौर में भी इस तरह की पारंपरिक डिशेज अपनी पहचान बनाए हुए हैं. यह न सिर्फ स्वाद का अनुभव देती है, बल्कि पहाड़ों की सादगी और प्राकृतिक जीवनशैली की झलक भी दिखाती है. यही वजह है कि आज भी लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं.

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