डाइक्लोफेनाक के बाद अब आवारा कुत्ते गिद्धों के लिए नई आफत? 72 प्रतिशत जगहों से घोंसलों का पता नहीं
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Vulture Crisis : गिद्धों पर नया संकट मंडराने लगा है. गिद्ध एक ऐसी प्रजाति है जो समाज को कई जरूरी इकोसिस्टम सर्विसेज प्रदान करती है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है. तीन प्रमुख प्रजातियां व्हाइट-रम्प्ड वल्चर, इंडियन वल्चर और स्लेंडर-बिल्ड वल्चर सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं. एएमयू वाइल्ड लाइफ विभाग विशेषज्ञ डॉ. कलीम अहमद लोकल 18 से कहते हैं कि इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण डाइक्लोफेनाक नाम की दवा को माना गया, जिसका उपयोग पशुओं के इलाज में किया जाता है. वर्तमान में एक बड़ा खतरा आवारा कुत्ते भी बन चुके हैं.
अलीगढ़. गिद्ध, जिन्हें अंग्रेजी में वल्चर (Vultures) कहा जाता है, प्रकृति के ऐसे अहम जीव हैं जो इकोसिस्टम को संतुलित बनाए रखने में बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यह एक ऐसी प्रजाति है जो समाज को कई जरूरी “इकोसिस्टम सर्विसेज” प्रदान करती है, लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है. एएमयू के वाइल्ड लाइफ विभाग के विशेषज्ञ डॉ. कलीम अहमद के अनुसार, गिद्ध मुख्य रूप से मृत जानवरों यानी कारकस को खाकर पर्यावरण को साफ रखने का काम करते हैं. इससे न केवल गंदगी कम होती है, बल्कि कई खतरनाक बीमारियों के फैलने का खतरा भी घट जाता है. इस लिहाज से गिद्ध मानव स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी माने जाते हैं. साल 1996 से 2000 के बीच हुई विभिन्न स्टडीज में यह सामने आया कि भारत में गिद्धों की आबादी में लगभग 96 प्रतिशत तक की गिरावट आई. खासकर तीन प्रमुख प्रजातियां व्हाइट-रम्प्ड वल्चर, इंडियन वल्चर और स्लेंडर-बिल्ड वल्चर सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं.
डॉ. कलीम का कहना है कि इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण एक दवा “डाइक्लोफेनाक” (Diclofenac) को माना गया, जिसका उपयोग पशुओं के इलाज में किया जाता था. जब गिद्ध ऐसे पशुओं के शव खाते थे जिनमें यह दवा मौजूद होती थी, तो यह उनके लिए घातक साबित होती थी. इसके बाद भारत समेत दक्षिण एशिया के कई देशों ने इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया. एसिक्लोफेनाक और कीटोप्रोफेन जैसी अन्य हानिकारक दवाओं को भी सीमित किया गया और इनके स्थान पर सुरक्षित विकल्प सुझाए गए.
फीडिंग पैटर्न को खतरा
डॉ. कलीम के अनुसार, गिद्धों की घटती संख्या को देखते हुए सरकार और संरक्षण संगठनों ने कई अहम कदम उठाए. ब्रीडिंग सेंटर स्थापित किए गए, जहां गिद्धों का संरक्षण और प्रजनन कर उन्हें दोबारा जंगलों में छोड़ा जा रहा है. हाल ही में भारतीय वन्यजीव संस्थान के एक अध्ययन में पाया गया कि जिन स्थानों पर पहले गिद्धों के घोंसले पाए जाते थे, उनमें से करीब 72 प्रतिशत स्थानों पर अब गिद्ध नहीं मिल रहे हैं. इससे साफ है कि अभी भी उनकी आबादी पूरी तरह से स्थिर नहीं हो पाई है. डॉ. कलीम कहते हैं कि वर्तमान में एक बड़ा खतरा “फेरल डॉग्स” (आवारा कुत्ते) भी बन चुके हैं. ये न केवल गिद्धों के भोजन स्रोत पर कब्जा कर लेते हैं, बल्कि उनके व्यवहार और फीडिंग पैटर्न को भी प्रभावित करते हैं.
ये काम जरूरी
गिद्धों के लिए सुरक्षित बैठने और घोंसले बनाने के स्थानों की कमी भी एक बड़ी समस्या बन रही है. गिद्धों के संरक्षण के लिए डॉग-फ्री फीडिंग जोन बनाने, सुरक्षित दवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने जैसे उपाय जरूरी माने जा रहे हैं. डॉ. कलीम का मानना है कि गिद्ध केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के रक्षक हैं. यदि ये नहीं होंगे तो मृत पशुओं के अवशेष सड़कर खतरनाक बैक्टीरिया और वायरस को जन्म देंगे, जिससे इंसानों में गंभीर बीमारियां फैल सकती हैं.
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Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें