OPINION: विराट की बल्लेबाजी पर नई बहस, टिक कर भी खेला जा सकता है टी-20, एग्रेशन पर भारी पड़ता कैल्कुलेशन!

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नई दिल्ली. टी20 क्रिकेट को अक्सर “सिर्फ अटैक” का खेल कहा जाता है जहां हर गेंद पर बड़ा शॉट ही सफलता की कुंजी मानी जाती है लेकिन कभी-कभी एक पारी इस सोच को पूरी तरह बदल देती है. एक ऐसी पारी,जो दिखाती है कि सिर्फ ताकत नहीं, समझ और संतुलन भी उतने ही जरूरी हैं. विराट कोहली की यह पारी उसी क्लास और कंट्रोल की मिसाल है, जो बताती है कि क्रिकेट आज भी सिर्फ आक्रामकता का खेल नहीं, बल्कि दिमाग और हालात को पढ़ने की कला है.

पिछले कुछ महीनों से लगातार यह सुनने को मिल रहा है कि टी20 क्रिकेट में “एंकर” की भूमिका खत्म हो चुकी है लेकिन हर बार जब विराट कोहली रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) के लिए मैच जिताऊ पारी खेलते हैं, यह बहस फिर से शुरू हो जाती है. सनराइजर्स हैदराबाद (SRH) के खिलाफ मुकाबले में कोहली ने टीम के कुल स्कोर का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बनाया. 203 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए उन्होंने नाबाद 69 रन बनाए. सवाल यह नहीं है कि उन्होंने कितने रन बनाएसवाल यह है कि क्या उन्होंने टीम को जीत दिलाईऔर जवाब है हां.

कोहली के कैलकुलेटर का काम

सच्चाई यही है कि आखिर में मायने सिर्फ जीत के होते हैं. RCB ने यह मैच 15.4 ओवर में ही जीत लिया, जिसमें कोहली ने चेज़ को बखूबी कंट्रोल किया और युवा खिलाड़ियों, खासकर देवदत्त पड्डीकल, को शानदार तरीके से गाइड किया. जब पडिक्कल बेहतरीन लय में थे, तब कोहली ने उन्हें ज्यादा से ज्यादा स्ट्राइक दी जो उस समय बिल्कुल सही फैसला था. एक समय पडिक्कल 11 गेंदों में 34 रन पर थे, जबकि कोहली 6 गेंदों में 7 रन पर लेकिन क्या इससे फर्क पड़ता है क्योंकि कोहली वही कर रहे थे, जो टीम के लिए उस समय जरूरी था. क्रिकेट में कोई एक फॉर्मूला नहीं होता हर मैच, हर स्थिति अलग होती है और यही हमने “बाज़बॉल” के दौर में भी देखा है.

टी-20 का मतलब सिर्फ तोड़ना नहीं

कोहली को बल्लेबाजी करते देखना बेहद सुखद था वह पूरी तरह कमिटेड और भूखे नजर आए और उन्होंने मैच की स्थिति को समझते हुए एक भी पल के लिए खेल को रुकने नहीं दिया साथ ही, उन्होंने नेट रन रेट का भी पूरा ध्यान रखा,जो सीजन के अंत में बेहद अहम साबित हो सकता है. हर मायने में यह एक शानदार पारी थी और हाँ,इसमें उन्होंने एंकर की भूमिका निभाई. इसलिए जब हम कहते हैं कि टी20 में एंकर की जगह नहीं रही, तो सच यह है कि क्लास के लिए हमेशा जगह होती है हर फॉर्मेट में, हर परिस्थिति में. सालों के दौरान कोहली ने अपनी टी20 बल्लेबाजी को आक्रामकता और समझ के बेहतरीन संतुलन में ढाला है. वह हर गेंद पर हमला नहीं करते और सच कहें तो इसकी हमेशा जरूरत भी नहीं होती. RCB को 255 नहीं, 203 रन का लक्ष्य हासिल करना था, जो आज के टी20 क्रिकेट में एक सामान्य स्कोर माना जाता है. कोहली को पता था कि क्या करना है, और उन्होंने उसे बखूबी अंजाम दिया.

रन बनाने से ज्यादा रन बनवाना जरूरी

दरअसल, पडिक्कल ने 61 रन की शानदार पारी खेलकर उनका काम और आसान कर दिया, खासकर पावरप्ले में दबदबा बनाकर. यही वजह है कि साझेदारियां इतनी अहम होती हैं पडिक्कल आक्रामक भूमिका में थे, जबकि कोहली ने सपोर्टिंग रोल निभाया. यह इस बारे में नहीं था कि कौन हावी रहा, बल्कि इस बारे में था कि टीम के लिए क्या बेहतर था. नई पीढ़ी के खिलाड़ी शायद हाई-रिस्क, हाई-रिवॉर्ड क्रिकेट खेलने की सोच के साथ बड़े होंगे लेकिन उन्हें कोहली की इस पारी को देखना चाहिए और समझना चाहिए कि क्रिकेट कभी एक-आयामी नहीं हो सकता. इस खेल में हमेशा कई परतें रहेंगी,और जो खिलाड़ी इन परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं, वही असली महान बनते हैं. कोहली की यह पारी उसी कला का एक बेहतरीन उदाहरण थी क्योंकि क्रिकेट की खूबसूरती उसकी इन्हीं परतों में छिपी है.

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