1 बीघा में 20 क्विंटल पैदावार, कीमत 2 हजार रुपये किलो…ये काली चीज किसानों के लिए असली सोना

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1 बीघा में 20 क्विंटल, ₹2 हजार प्रति किलो…ये काली चीज किसानों के लिए सोना

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Kali haldi ki kheti : सामान्य हल्दी की खेती भी किसानों के लिए वरदान है, लेकिन अगर बात काली हल्दी की खेती की करें तो कहने ही क्या. ये कम लागत में कई गुना अधिक मुनाफा देने वाली फसल है. औषधीय गुणों से भरपूर होती है. काली हल्दी की बुवाई आमतौर पर जून-जुलाई में की जाती है. सिंचाई का विशेष ध्यान रखना होता है, लेकिन जलभराव से भी बचना जरूरी है. लोकल 18 से कन्नौज के डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर संतोष कुमार बताते हैं कि काली हल्दी की फसल को ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती. सामान्य हल्दी के मुकाबले काली हल्दी कई गुना महंगी बिकती है. इसकी मांग विदेशों में भी बनी रहती है.

कन्नौज. काली हल्दी की खेती किसानों की किस्मत बदल रही है. ये कम लागत में कई गुना अधिक मुनाफा देने वाली फसल है. औषधीय गुणों से भरपूर काली हल्दी की बाजार में लगातार मांग बढ़ रही है, जिससे किसानों की आय में भी इजाफा हो रहा है. काली हल्दी की खेती के लिए सबसे पहले उपजाऊ, दोमट मिट्टी का चयन करना जरूरी है. खेत की अच्छी तरह जुताई कर उसे भुरभुरा बना लें. इसके बाद गोबर की सड़ी हुई खाद या जैविक खाद का प्रयोग करें. काली हल्दी की बुवाई आमतौर पर जून-जुलाई में की जाती है. इसके लिए बीज के रूप में गांठ का उपयोग किया जाता है. खेत में लगभग 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधे लगाए जाते हैं. सिंचाई का विशेष ध्यान रखना होता है, लेकिन जलभराव से बचना जरूरी है.

कम देखभाल, अच्छी पैदावार
लोकल 18 से कन्नौज के डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर संतोष कुमार बताते हैं कि काली हल्दी की फसल को ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती. समय-समय पर निराई-गुड़ाई और हल्की सिंचाई से फसल अच्छी तरह विकसित होती है. लगभग 8 से 9 महीने में फसल तैयार हो जाती है. एक बीघा खेत में करीब 15 से 20 क्विंटल तक उत्पादन लिया जा सकता है.

तंत्र मंत्र तक में उपयोगी

काली हल्दी की सबसे बड़ी खासियत इसकी ऊंची बाजार कीमत है. सामान्य हल्दी के मुकाबले काली हल्दी कई गुना महंगी बिकती है. औषधीय और धार्मिक उपयोग के कारण इसकी मांग देश ही नहीं, विदेशों में भी बनी रहती है. वर्तमान में काली हल्दी की कीमत 500 से 2000 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती है. काली हल्दी का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है. यह त्वचा रोग, दर्द, सूजन और कई अन्य बीमारियों में लाभकारी है. तंत्र-मंत्र और धार्मिक कार्यों में भी इसका उपयोग होता है, जिससे इसकी मांग हमेशा बनी रहती है.
संतोष कुमार बताते हैं कि कम लागत, कम जोखिम और ज्यादा मुनाफे के कारण यह फसल किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनती जा रही है.

About the Author

Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें

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