अमिताभ बच्चन के साथ डेब्यू करने वाला एक्टर, विलेन बन बनाया अपना दबदबा, जब बना हीरो तो हिला डाला सबका सिंहासन
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बॉलीवुड में बहुत कम स्टार्स ऐसे हैं, जिन्होंने अपना करियर विलेन के तौर पर शुरू किया और सुपरस्टार बनकर उभरे. 1969 में एक तरफ जहां अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में कदम रखा तो वहीं दूसरी तरफ शत्रुघ्न सिन्हा ने भी उसी साल अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की, वो भी एक दमदार स्टाइल के विलेन के रूप में. अपनी बोल्ड आवाज और एटीट्यूड से वे स्क्रीन पर इस हद तक छा गए कि जमे-जमाए हीरो फीके पड़ने लगे. जब वे ‘कालीचरण’ के रोल में हीरो के तौर पर दिखे तो उन्होंने बॉलीवुड के बड़े-बड़े स्टार्स के सिंहासन भी हिला दिए. आइए जानते हैं शत्रुघ्न सिन्हा के विलेन से सुपरस्टार बनने के सफर की अनकही कहानी.
नई दिल्ली. साल 1969 बॉलीवुड फिल्मों के इतिहास में एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ, जिसने आने वाले दशकों के लिए दो सुपरपावर की नींव रखी. ज्यादातर लोग जानते हैं कि अमिताभ बच्चन ने ‘सात हिंदुस्तानी’ से डेब्यू किया था, लेकिन कम ही लोग इस दिलचस्प बात से वाकिफ हैं कि शत्रुघ्न सिन्हा ने भी उसी समय बॉलीवुड में एंट्री की थी. यह एक ऐसे एक्टर की कहानी है जो हीरो बनना चाहता था, लेकिन उसने अपने करियर की शुरुआत एक खतरनाक विलेन के तौर पर की थी.
शत्रुघ्न सिन्हा का सफर बॉलीवुड के उन बहुत कम उदाहरणों में से एक है, जहां किसी विलेन की पॉपुलैरिटी इतनी बढ़ गई कि जनता उसे हीरो मानने पर मजबूर हो गई. आइए, शत्रुघ्न सिन्हा के उस जादुई सफर के बारे में जानें, जिसने विलेन से सुपरस्टार बनने का पूरा इक्वेशन बदल दिया.
अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा ने लगभग एक ही समय में फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री की थी. जहां अमिताभ अपने लंबे कद और गहरी आवाज से अपनी जगह बना रहे थे, वहीं शत्रुघ्न सिन्हा अपनी दमदार आवाज और चेहरे के दाग-धब्बों से डायरेक्टर्स को इम्प्रेस कर रहे थे. दोनों को शुरुआत में स्ट्रगल करना पड़ा, लेकिन शत्रुघ्न को नेगेटिव रोल्स से पहचान मिली. उन्होंने ‘प्यार ही प्यार’ और ‘प्रेम पुजारी’ जैसी फिल्मों में छोटे लेकिन असरदार रोल किए.
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70 के दशक की शुरुआत में, शत्रुघ्न सिन्हा ने विलेन के तौर पर ऐसा दबदबा बनाया कि बड़े-बड़े एक्टर भी उनके सामने फीके पड़ जाते थे. उनकी डायलॉग डिलीवरी इतनी यूनिक थी कि दर्शक हीरो से ज्यादा विलेन के आने का इंतजार करते थे. फिल्मों में उनका गर्दन हिलाकर बोलने का तरीका और सिगरेट पीना युवाओं के बीच क्रेज बन गया था. चाहे ‘मेरे अपने’ में ‘छेनू’ का रोल हो या ‘रामपुर का लक्ष्मण’ में विलेन का, शत्रुघ्न ने साबित कर दिया कि विलेन सिर्फ डराने के लिए नहीं, बल्कि शो चुराने के लिए भी होता है. कहा जाता है कि उस जमाने के डिस्ट्रीब्यूटर कहते थे कि अगर किसी फिल्म में ‘दुश्मन’ विलेन हो, तो फिल्म का आधा काम हो जाता है.
बॉलीवुड में ऐसा बहुत कम होता है कि लोग किसी विलेन को हीरो के तौर पर देखें. शत्रुघ्न सिन्हा ने इस गलतफहमी को तोड़ दिया. जब सुभाष घई ने 1976 में अपनी पहली फिल्म ‘कालीचरण’ बनाई, तो उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा पर दांव लगाया. यह एक बहुत बड़ा रिस्क था, क्योंकि यह पक्का नहीं था कि लोग एक जाने-माने विलेन को हीरो के तौर पर अपनाएंगे या नहीं. ‘कालीचरण’ रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर इतनी बड़ी हिट हुई कि हर कोई हैरान रह गया. फिल्म ब्लॉकबस्टर रही, और शत्रुघ्न सिन्हा रातोंरात सुपरस्टार बन गए.
इसके बाद ‘विश्वनाथ’, ‘गौतम गोविंदा’ और ‘दोस्ताना’ जैसी फिल्मों ने यह पक्का कर दिया कि शत्रुघ्न सिन्हा में अब किसी भी बड़े हीरो की गद्दी हिलाने की ताकत है. उनकी पॉपुलैरिटी इतनी बढ़ गई कि एक समय तो उन्हें अमिताभ बच्चन का सबसे बड़ा कॉम्पिटिटर माना जाने लगा. अमिताभ और शत्रुघ्न ने ‘बॉम्बे टू गोवा’, ‘परवाना’, ‘काला पत्थर’ ‘शान’ और ‘दोस्ताना’ जैसी कई फिल्मों में साथ काम किया. उनकी ऑन-स्क्रीन जोड़ी जितनी सफल रही, ऑफ-स्क्रीन उनकी दुश्मनी भी उतनी ही गहरी थी.
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘एनीथिंग बट खामोश’ में यह भी बताया है कि कैसे एक समय पर अमिताभ की बढ़ती पॉपुलैरिटी की वजह से उनके और उनके बीच तनाव पैदा हो गया था. यह वह समय था जब इस बात पर गरमागरम बहस होती थी कि फिल्म के पोस्टर पर सबसे पहले किसका नाम आएगा और सबसे दमदार डायलॉग किसके होंगे. इन सबके बावजूद, उन्होंने मिलकर बॉलीवुड को वह मसाला युग दिया जिसे आज भी याद किया जाता है.