अंग्रेज कैसे 100 साल पहले लाए डालडा घी, पहुंचा हर घर, पूरी से जलेबी छनती थी इसमें, नाम की कहानी भी दिलचस्प

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हमारी ‘जेन जी’ ‘डालडा’ के बारे में कितना जानती है, ये तो पता नहीं लेकिन जो लोग अब 45 साल या इससे ज्यादा की उम्र के हैं, वो ‘डालडा’ के बारे में बखूबी जानते हैं. कभी ये हर भारतीय रसोई की जान होता था. एक जमाने में घी का मतलब ही ‘डालडा’ था. पराठे से लेकर पूरिया तक उसमें बनाई जाती थीं. शादी के दिनों में हलवाई इसके कई कनस्तर जरूर मंगवाते थे. लड्डू से लेकर इमरती और जलेबी से लेकर कचौड़ी तक उसी में बनाते थे. भारत में ‘डालडा’ के आने और छाने की कहानी दिलचस्प है.

अंग्रेजों ने हमारी बहुत सी आदतें अपने राज में बदल दीं, उसमें ‘डालडा’ के जरिए हमारा खान-पान भी था. ‘डालडा’ के नाम की कहानी भी खुद काफी दिलचस्प है.

एक ब्रिटिश कंपनी हिंदुस्तान वनस्पति मेनुफैक्चरिंग कंपनी भारत में डालडा लेकर आई. जो बाद में हिंदुस्तान लीवर का हिस्सा बन गई. दरअसल डालडा की असल तकनीक और आइडिया आया था डच कंपनी यूनिलिवर से. 1920–30 के दशक में यूरोप में वनस्पति तेल को हाइड्रोजनेशन करके घी जैसा ठोस फैट बनाया जाने लगा था. इसी तकनीक से ये वनस्पति घी बना.

कैसे मिला ‘डालडा’ नाम

1930 के आसपास इसे भारत में लांच किया गया. इसका ब्रांड नाम रखा गया डालडा. दिलचस्प बात ये भी है कि “डालडा” नाम कैसे बना. उस समय एक डच कंपनी Dada & Co. भारत में वनस्पति घी बेचने की योजना बना रही थी. बाद में यूनिलीवर्स ने इसमें निवेश किया. तो डच कंपनी का नाम डाडा और लीवर्स का “L” को जोड़कर नाम बना ‘डालडा’ (Dalda).

वर्ष 1961 में डालडा घी का एक विज्ञापन (फाइल फोटो)

डालडा से पहले क्या था

डालडा से पहले भारत में मुख्य रूप से देसी घी ही इस्तेमाल होता था.ये तीन तरह का होता था. यह तीन तरह का होता था – गाय का घी, भैंस के दूध का घी और घर में बना बिलौना घी. भारत में 20 सदी के शुरू तक ज्यादातर ग्रामीण और कस्बाई घरों में मलाई की दही को मथकर सफेद मक्खन निकाला जाता था और उसको गर्म करके घी बनाते थे.

हालांकि तब खाना बनाने के लिए सरसों, तिल, नारियल और मूंगफली का तेल भी खूब इस्तेमाल होता था. देसी घी पूजा -पाठ से लेकर शादी ब्याह में उपयोग में लाया जाता था. लेकिन 1930 के दशक के आते आते देसी घी बहुत मंहगा पड़ने लगा. शहरों में घी की मांग बढ़ने लगी और दूध इतना ज्यादा देश में नहीं हो पा रहा था. तब ब्रिटिश राज में कंपनियों ने सोचा कि अगर सस्ता “घी जैसा” प्रोडक्ट बनाया जाए तो बड़ा बाजार मिल सकता है.वनस्पति तेल को हाइड्रोजनेशन करके ठोस बनाया गया और कहा गया,

यह घी जैसा ही है, लेकिन सस्ता

भारत में डालडा का प्रचार कैसे किया गया

डालडा का प्रचार उस समय भारत के सबसे आक्रामक विज्ञापन अभियानों में एक था. डालडा की पीली हरी वैन में शहर शहर में चलती थीं. इसमें कढ़ाई रखी जाती थी. हलवा, पकौड़े और समोसे बनाए जाते थे. लोगों को मुफ्त खिलाया जाता था. भरोसा दिलाया जाता था, “देखिए, इसमें बना खाना बिल्कुल घर के देसी घी जैसा ही है.” मेलों में स्टॉल लगाए जाते थे. खाना बनाकर खिलाया जाता था. सस्ते छोटे टिन पैक बेचे जाते थे.

1954 में डालडा का एक विज्ञापन, जिसमें इसे शुद्ध और पौष्टिक बताया गया है (फाइल फोटो)

सिनेमा हॉल में विज्ञापन

1930–50 के दशक में सिनेमा बहुत लोकप्रिय हो रहा था. फिल्म शुरू होने से पहले स्क्रीन पर डालडा का विज्ञापन दिखाया जाता था.

“डालडा में बना खाना स्वादिष्ट और सस्ता”

अखबारों और पोस्टरों में इसके एड होते थे. पुराने पोस्टरों में अक्सर ये लाइन होती थी – “घी जैसा स्वाद, आधी कीमत”, “शुद्ध वनस्पति घी”. इसकी एक टैग लाइन बहुत फेमस हुई,

जहां ममता…वहां डालडा

कई मिठाई की दुकानों को सस्ता डालडा दिया गया. इससे वो लड्डू, जलेबी, बर्फी बनाने लगे. नमकीन छानने लगे. इसी से पूरियां और समोसे निकाले जाने लगे. यानि शहर और कस्बों के हलवाइयों ने बड़ी मात्रा में इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया. फिर ये स्वाद जीभ पर चढ़ने लगा. धीरे धीरे घी का मतलब हो गया डालडा.

भारतीयों को कैसे आदत लगी

शुरुआत में लोग इसे पसंद नहीं करते थे. लेकिन देसी घी की तुलना में डालडा काफी सस्ता था. मिठाई बनाने में ये खूब इस्तेमाल होने लगा. शहरी परिवारों के लिए भी खुद शुद्ध घी बनाने की बजाए इसका इस्तेमाल ज्यादा आसान था. हालांकि लोगों को इसको लेकर काफी शंकाएं भी थीं. बहुत से लोग इसको नकली घी मानते थे. कुछ लोगों को डर था कि इसमें पशु-चरबी मिलाई जाती है. इसे लेकर तरह तरह की अफवाहें फैलीं.

वर्ष 1955 का डालडा घी का एक एड, जिसमें ये कहा गया कि ये एनर्जी देता है. (फाइल फोटो)

मिलावट के आरोप भी

जब डालडा लोकप्रिय हुआ तो बाजार में असली देसी घी की मांग कम होने लगी. तब कुछ व्यापारियों ने इसे मिलाकर मिलावटी देसी घी बेचना शुरू कर दिया. वो थोड़ा सा असली घी लेकर और ज्यादा मात्रा में डालडा लेकर और फिर दोनों मिलाकर “शुद्ध घी” के नाम पर बेच देते थे. इससे डालडा की मिलावटी घी की छवि बनने लगी.

1960–80 के दशक में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने कहना शुरू किया कि वनस्पति घी में ट्रांस-फैट ज्यादा हो सकता है. डॉक्टरों ने लोगों को चेतावनी देना शुरू किया. फिर एक समय भारत में ये अफवाह बहुत फैली कि डालडा में पशु-चरबी मिलाई जाती है. हालांकि कंपनी बार-बार कहती रही कि यह पूरी तरह वनस्पति तेल से बना है. ग्रामीण भारत में इसका असर काफी पड़ा।

कैसे डालडा का गायब होने लगा

1990 के दशक तक स्थिति बदलने लगी. लोग रिफाइंड तेल खरीदने लगे. हेल्थ अवेयरनेस बढ़ी. वनस्पति घी की छवि खराब हो गई. जिस ब्रांड ने एक समय भारत में राज किया था, वही धीरे-धीरे बाजार से गायब होने लगा. हालांकि डालडा नाम आज भी मौजूद है, लेकिन उसका वह दबदबा नहीं रहा.

पहला प्लांट कहां लगा

भारत में डालडा का पहला बड़ा प्लांट 1930 के दशक में मुंबई में लगा. इसके बाद यूपी में कानपुर और गाजियाबाद जैसे शहरों में भी डालडा की उत्पादन फैक्ट्रियां लगीं. इसके प्लांट कोलकाता और चेन्नई में भी थे.

डालडा घी का एक और 60 के दशक का विज्ञापन, जिसमें कहा गया कि ये ज्यादा एनर्जी देता है. (फाइल फोटो)

किन चीजों से बनता था 

डालडा असल में वनस्पति घी था, यानी ऐसा घी जो दूध से नहीं बल्कि वनस्पति तेलों से बनाया जाता था. इसे बनाने में ये सब मिलाया जाता था
– पाम ऑयल
– पाम कर्नेल ऑयल
– कॉटनसीड ऑयल (कपास के बीज का तेल)
– मूंगफली का तेल
– कभी-कभी सोयाबीन तेल
इन तेलों को मिलाकर एक बेस तैयार किया जाता था. फिर इस तेल को एक खास प्रक्रिया से गुजारा जाता था जिसे हाइड्रोजनेशन कहते थे. होता ये था कि तेल को बड़े टैंक में गर्म किया जाता था. फिर इसमें हाइड्रोजन गैस डाली जाती थी. निकेल कैटेलिस्ट की मदद से रासायनिक प्रतिक्रिया कराई जाती थी. इस प्रक्रिया से तरल तेल ठोस फैट में बदल जाता है. यही ठोस पदार्थ वनस्पति घी कहलाता है.

क्योंकि असली घी की खुशबू अलग होती है, इसलिए कंपनियां कुछ चीजें और मिलाती थीं, मसलन हल्के पीले रंग के लिए बीटा-कैरोटीन, फ्लेवर जो घी जैसी खुशबू दे. थोड़ा सा विटामिन A और D. इससे ये देखने और सूंघने में घी जैसा लगे.

अब डालडा का क्या हाल

डालडा वनस्पति घी कभी भारतीय रसोईघरों का राजा था, लेकिन अब यह बाजार से करीब गायब हो चुका है. इसने 40 साल तक बाजार पर राज किया. ट्रांस फैट के नुकसानों की जानकारी फैली तो लोग शुद्ध घी, मक्खन या रिफाइंड ऑयल की ओर मुड़े. 2003 में यूनिलीवर ने बंज लिमिटेड को ब्रांड बेच दिया लेकिन फिर ये बाजार में लौट नहीं पाया. आज डालडा मुख्यधारा के बाजार से बाहर है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में सीमित उपलब्धता हो सकती है.

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