अमिताभ बच्चन की वो 20 फिल्में, जिन्होंने छीन ली थी राजेश खन्ना की नींद, 1978 के बाद बदला स्टारडम का पूरा गेम
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70 का दशक बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना के लिए एक सपने जैसा था, लेकिन अमिताभ बच्चन की लगातार 20 सफल फिल्मों ने इसे एक डरावनी सच्चाई में बदल दिया. 1973 की ‘जंजीर’ से शुरू हुआ यह ट्रेंड 1978 की ‘मुकद्दर का सिकंदर’ तक बॉलीवुड को पूरी तरह से बदल चुका था. इन फिल्मों की सफलता ने राजेश खन्ना के मन में स्टारडम खोने का ऐसा डर पैदा कर दिया. आइए, जानते हैं अमिताभ की उन 20 फिल्मों के बारे में, जिनकी मदद से अमिताभ बनी सदी के महानायक.
नई दिल्ली. 70 का दशक बॉलीवुड के इतिहास में किसी रोमांचक फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं था. एक तरफ बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना का जादू था, जिनके आगे बड़े-बड़े सेलिब्रिटी भी सिर झुकाते थे तो दूसरी तरफ वह लंबा-चौड़ा नौजवान था, जिसने अपने शुरुआती दिनों में 12 फ्लॉप फिल्में झेली थीं. लेकिन 1973 और 1978 के बीच कुछ ऐसा हुआ कि राजेश खन्ना को सच में अपना स्टारडम खोने का डर सताने लगा.
अमिताभ बच्चन की उन 20 लैंडमार्क फिल्मों ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस के समीकरण बदले, बल्कि राजेश खन्ना के ‘चॉकलेटी रोमांस’ के दौर को भी खत्म कर दिया और ‘एंग्री यंग मैन’ के सुनहरे दौर की शुरुआत की. आइए, जानते हैं उस दौर के बारे में जब बॉलीवुड का पूरा खेल बदल गया. कहानी शुरू होती है 1973 से, जब राजेश खन्ना बॉक्स ऑफिस पर छाए हुए थे. लेकिन फिर, ‘जंजीर’ से पुलिस की वर्दी पहने एक ‘एंग्री यंग मैन’ ने ऐसी धूम मचाई कि पूरा सिस्टम हिल गया.
इसके तुरंत बाद, ऋषिकेश मुखर्जी की ‘नमक हराम’ आई, जिसमें राजेश खन्ना के सामने खड़े अमिताभ ने शो चुरा लिया और कहा जाता है कि तभी पहली बार ‘काका’ को अपना स्टारडम खोने का डर सताने लगा. उसी साल अमिताभ ने ‘अभिमान’ में एक कलाकार के ईगो की कहानी कहकर दर्शकों के दिलों में गहरी जगह बनाई. अगले दो सालों में अमिताभ बच्चन ने थ्रिलर और ड्रामा का कॉकटेल पेश किया, जिससे वह ‘मजबूर’, ‘कसौटी’ और ‘बेनाम’ जैसी फिल्मों से घर-घर में मशहूर हो गए.
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1975 वह साल था जिसने बॉलीवुड के इतिहास को बांट दिया. एक तरफ ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन के ‘आज खुश तो बहुत होगे तुम’ ने राजेश खन्ना के ‘चॉकलेट रोमांस’ के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी, तो दूसरी तरफ ‘शोले’ की सुनामी ने उन्हें ‘सिक्का उछालने वाले’ के तौर पर स्थापित कर दिया. उसी साल ‘जमीर’ और ‘मिली’ जैसी फिल्मों ने उनकी एक्टिंग की वर्सटैलिटी को दिखाया. 1970 के दशक के आगे बढ़ने के साथ, राजेश खन्ना को सोलो फिल्में पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा, जबकि अमिताभ बच्चन ने मल्टी-स्टारर फिल्मों के साथ बॉक्स ऑफिस पर राज किया.
‘दो अनजाने’ में बदले की आग और ‘हेरा फेरी’ की मस्ती ने उन्हें युवाओं का पसंदीदा बना दिया. फिर 1977 में ‘अमर अकबर एंथनी’ ने कॉमेडी और कमर्शियल सिनेमा के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. इसने ‘परवरिश’, ‘खून पसीना’ और ‘अदालत’ जैसी बैक-टू-बैक हिट फिल्मों के साथ, राजेश खन्ना को एहसास दिलाया कि वह दौर जब सिर्फ ‘गर्दन टेढ़ी करके मुस्कुराने’ से फिल्में बन जाती थीं, अब खत्म हो गया है.
आखिरकार, 1978 वह ‘गोल्डन ईयर’ बन गया जिसने पूरी तरह से खेल बदल दिया. ‘डॉन’ के रूप में, उन्होंने अंडरवर्ल्ड का ऐसा अकड़ दिखाया कि दुनिया दीवानी हो गई, जबकि ‘त्रिशूल’ में अपने पिता के खिलाफ खड़े एक बागी बेटे के रूप में उनकी दहाड़ ने राजेश खन्ना की बची-खुची हिम्मत को चकनाचूर कर दिया. उसी साल ‘कसमे वादे’ में अमिताभ बच्चन के डबल रोल और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में उनके बलिदान, जिसमें सिकंदर जोहराबाई के कोठे पर मर जाता है, ने अमिताभ बच्चन को बॉलीवुड का बेताज बादशाह बना दिया.
इन 20 फिल्मों के सफर ने राजेश खन्ना को एहसास दिलाया कि ‘किंग ऑफ रोमांस’ का दौर खत्म हो गया है और ‘वन मैन इंडस्ट्री’ का दौर शुरू हो गया है. इन 20 फिल्मों की लगातार सफलता ने राजेश खन्ना को दिमागी तौर पर हिला दिया था. 1978 के बाद, ‘काका’ को एहसास हुआ कि उनका नाम अब थिएटर में नहीं दिखाया जा रहा है.
राजेश खन्ना की हार का सबसे बड़ा कारण बदलाव को अपनाने की उनकी अनिच्छा थी. 1978 तक सिनेमाई सोच बदल चुका था. महंगाई, बेरोजगारी और इमरजेंसी के बाद का गुस्सा हर जगह था. राजेश खन्ना अभी भी ‘बावर्ची’ और ‘आनंद’ की सादगी में डूबे हुए थे, जबकि अमिताभ ‘सिस्टम के खिलाफ बागी’ बन गए थे.