आखिर तालाब में गोइठा क्यों फेंक रहीं ये महिलाएं, होली से इसका कनेक्शन, नवरात्र से भी रिश्ता, जानें

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Goitha Tradition Chanaduli : हमारे यहां होली सिर्फ रंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कई परंपराएं कई दिनों बाद तक मनाई जाती हैं. चंदौली की होलकी माई ऐसी ही रवायत है. यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. लोकल 18 ने इस बारे में चंदौली की महिलाओं से बात की. शैल कुमारी बताती हैं कि तालाब में गोइठा (उपले) डालने की यह परंपरा बहुत पुरानी है. पुरुष जहां होलिका दहन करते हैं, महिलाओं की अपनी होलकी होती है. इस परंपरा का संबंध नवरात्र से भी जुड़ा है.

चंदौली. ग्रामीण भारत में होली का त्योहार सिर्फ रंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कई अनोखी और प्राचीन परंपराएं भी आज तक जीवित हैं. ऐसी ही एक परंपरा चंदौली जिले में भी है, इसे ‘होलकी माई’ कहते हैं, जिसे खासतौर पर महिलाएं निभाती हैं. यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. चंदौली की शैल कुमारी देवी लोकल 18 से बताती हैं कि तालाब में गोइठा (उपले) डालने की यह परंपरा बहुत पुरानी है. पुरुष जहां होलिका दहन करते हैं, महिलाओं की अपनी ‘होलकी’ होती है. इसमें गोइठा और लकड़ी का उपयोग किया जाता है. इसके बाद इस ‘होलकी माई’ को तालाब में प्रवाहित किया जाता है. इस परंपरा का संबंध नवरात्र से भी जुड़ा है. होली के लगभग 30 दिन बाद नवरात्र में इसे फिर से स्थापित किया जाता है और 3 दिनों बाद पुनः जल में विसर्जित किया जाता है. इस दौरान रोटी चढ़ाकर पूजा-अर्चना भी की जाती है.

कहां से पहुंची यहां

परमशिला देवी भी इस परंपरा की महत्ता को बताते हुए लोकल 18 से कहती हैं कि यह प्रथा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है. जैसे पुरुष बाहर होलिका जलाते हैं, वैसे ही महिलाएं ‘होलकी माई’ को तालाब में प्रवाहित करती हैं. अगले दिन सुबह रोटी चढ़ाकर पूजा की जाती है. यह परंपरा उनकी अजीया सास (दादी सास) से शुरू होकर सास और अब उनकी पीढ़ी तक पहुंची है.

सिर्फ परंपरा नहीं

गौरी देवी बताती हैं कि यह एक बहुत पुरानी परंपरा है, जिसे महिलाएं बड़े श्रद्धा भाव से निभाती हैं. तालाब में गोइठा फेंकना, ‘होलकी माई’ को प्रवाहित करना और फिर पूजा-पाठ करना इस परंपरा के प्रमुख हिस्से हैं. यह परंपरा न सिर्फ धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि महिलाओं की सामूहिक भागीदारी और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी प्रतीक है. बदलते समय के बावजूद, गांवों में ऐसी परंपराएं आज भी समाज की जड़ों को मजबूत बनाए हुए हैं.

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Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें

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