सिपाही की खाल उतारने वाले के लिए आंसू क्यों? ‘धुरंधर 2’ में अतीक के महिमामंडन पर भड़के यूपी के पूर्व DGP
Dhurandhar 2: राजनीति और मनोरंजन के कॉकटेल के बीच माफिया अतीक अहमद की चर्चा फिर से गर्म है. फिल्म ‘धुरंधर 2’ को लेकर यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक और नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. विक्रम सिंह ने तीखे प्रहार किए हैं. उन्होंने दो टूक कहा कि जो लोग अतीक अहमद को ‘गरीबों का मसीहा’ या ‘रॉबिनहुड’ बताकर उसका महिमामंडन कर रहे हैं, वे समाज के साथ भद्दा मजाक कर रहे हैं. विक्रम सिंह ने अतीक के खौफनाक दौर, उसके ISI कनेक्शन और उस ऐतिहासिक ‘बुलडोजर’ कार्रवाई के अनसुने किस्से साझा किए हैं, जिसने माफिया साम्राज्य की नींव हिला दी थी.
मनोरंजन या तुष्टिकरण की राजनीति?
फिल्मों की शुरुआत में अक्सर यह डिस्क्लेमर आता है कि ‘सभी पात्र काल्पनिक हैं’, लेकिन पूर्व DGP विक्रम सिंह का मानना है कि आज फिल्मों के जरिए भी राजनीति और तुष्टिकरण का खेल खेला जा रहा है. उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर एक अपराधी में राजनीति क्यों ढूंढी जा रही है? अतीक अहमद कोई ‘आइकॉनिक’ या परम पूजनीय व्यक्तित्व नहीं था, जिसके लिए असली या ग्लिसरीन के आंसू बहाए जाएं. विक्रम सिंह ने कहा,
मुझे घोर आपत्ति है कि IS-227 (गैंग नंबर) के सरगना को महिमामंडित किया जाए. जिस पर 100 से ज्यादा संगीन केस थे, जिसने राजू पाल जैसे विधायक की हत्या की और 50 से अधिक कत्ल किए, वह मसीहा कैसे हो सकता है?
वो खौफनाक मंजर: जब सिपाही के साथ हुआ बकरे जैसा सुलूक
अतीक के काले इतिहास को याद करते हुए पूर्व DGP भावुक और आक्रोशित नजर आए. उन्होंने कहा कि लोग शायद वो दिन भूल गए हैं जब इस माफिया के गुर्गों ने एक सिपाही की खाल उतारकर उसे बकरे की तरह टांग दिया था. उन्होंने माफिया के अंत को ‘आततायी का खात्मा’ करार दिया. विक्रम सिंह ने साफ कहा कि कुछ लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए अतीक को ‘रॉबिनहुड’ दिखाने की निकृष्ट चाल चल रहे हैं, जो समाज के लिए घातक है.
ISI कनेक्शन और फेक करेंसी का काला साम्राज्य
इंटरव्यू के दौरान अतीक के देशविरोधी चेहरों पर भी रोशनी डाली गई. विक्रम सिंह ने बताया कि अतीक ने खुद कबूल किया था कि उसके संबंध लश्कर-ए-तैयबा और ISI से थे. नेपाल के रास्ते जाली नोटों का धंधा धड़ल्ले से चलता था. इस काले कारोबार को सफेद करने के लिए बॉर्डर पर हिमालयन बैंक तक का इस्तेमाल किया गया. अतीक का नेटवर्क सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं था, बल्कि अंडरवर्ल्ड के साथ मिलकर वह ड्रग्स के धंधे में भी शामिल था.
2007 का वो किस्सा: जब शाइस्ता परवीन DGP के पास पहुंची
विक्रम सिंह ने अपने कार्यकाल का एक बेहद दिलचस्प वाकया सुनाया. 2007 में जब वे DGP बने, तब अतीक के भाई (अशरफ) ने एक मदरसे की बच्चियों के साथ गैंगरेप किया था. पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की, FIR दर्ज हुई और अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चला. विक्रम सिंह बताते हैं, अतीक के परिवार को यकीन नहीं था कि उन पर कार्रवाई होगी. तब उसकी पत्नी शाइस्ता परवीन मेरे पास आई और कहा कि मैं बेवा नहीं होना चाहती. मैंने उसे दो टूक जवाब दिया- बेवा होना या न होना आपके पति के कर्म तय करेंगे. अगर उसने मुझे खिदमत का मौका दिया, तो मैं ऐसी खिदमत करूंगा कि वो याद रखेगा. समझदार को इशारा काफी था.
नेताओं और भ्रष्ट पुलिस का ‘कमाऊ पूत’
माफियाओं के फलने-फूलने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि अतीक जैसे लोग कुछ राजनेताओं और भ्रष्ट पुलिस वालों के लिए ‘कमाऊ भूत’ थे. उस दौर में ‘म्यूचुअल बेनिफिट समिति’ चलती थी, यानी तुम हमें पैसा दो, हम तुम्हें संरक्षण देंगे. जो ईमानदार अफसर आवाज उठाता, उसकी नौकरी पर खतरा मंडराता था. लेकिन जब सरकार ने इच्छाशक्ति दिखाई और पुलिस को खुली छूट दी, तो माफिया मिट्टी में मिल गए.
कलाम की कब्र और अतीक की तारीफ: दोहरा मापदंड?
विक्रम सिंह ने समाज के एक वर्ग पर निशाना साधते हुए पूछा, ‘जो लोग अतीक के लिए पुल बांध रहे हैं, क्या वे कभी भारत रत्न एपीजे अब्दुल कलाम की कब्र पर गए हैं? नहीं, क्योंकि वहां से उन्हें कोई राजनीतिक वोट बैंक नहीं मिलने वाला था.’