गाजीपुर का ‘होरहा’: देसी स्वाद, सेहत और परंपरा की अनोखी कहानी
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गाजीपुर की मिट्टी में आज भी ‘होरहा’ जैसी परंपरा सुलगती है, जो सिर्फ एक व्यंजन नहीं बल्कि स्वाद, सेहत और आपसी जुड़ाव का प्रतीक है. खेतों में ताज़े चने को आग में भूनकर तैयार होने वाला यह देसी स्वाद, अपनी सोंधी खुशबू और स्मोकी फ्लेवर के साथ पुरानी यादों को जिंदा कर देता है.
गाजीपुर. पिज्जा और बर्गर के इस दौर में, गाजीपुर की गलियों और गांवों के खेतों में आज भी एक ऐसी परंपरा जीवित है, जिसका स्वाद किसी भी फाइव-स्टार डिश को मात दे सकता है. इसे स्थानीय भाषा में होरहा कहा जाता है, जो न केवल स्वाद बल्कि सेहत और सामुदायिक प्रेम का भी प्रतीक है. एक ऐसा व्यंजन जो स्वाद के साथ सेहत और आपसी जुड़ाव का प्रतीक भी है. फुल्लनपुर शिवधाम कॉलोनी के ग्रामीण निवासी विनीत तिवारी इस पारंपरिक विधि को बड़े चाव से समझाते हैं. वे बताते हैं कि यह कोई साधारण कुकिंग नहीं, बल्कि एक कला है जिसे ‘ओपन-फायर रोस्टिंग’ कहा जाता है. विनीत तिवारी बताते है की एक लंबे बांस की डंडी लेकर उस पर चने के पौधों को फैला देते हैं और उसे उल्टा लटका दिया जाता है. इसमें पेड़ की जड़ ऊपर और फल (चने) नीचे की तरफ होते हैं. इसके बाद सूखे पत्तों या पुआल (पराली) के जरिए आग लगाई जाती है. इसे तब तक भूना जाता है जब तक ये अधपका न हो जाए, ध्यान रहे कि इसे पूरा जलाना नहीं है. जब लगता है कि ये तैयार है, तो डंडी से उतार कर इसे बराबर फैलाकर ठंडा किया जाता है.
स्मोकी फ्लेवर और पोषण का खजाना
रिसर्च बताती है कि चने या फलियों को सीधे आग में भूनने यानी के रोस्टिंग से उनमें मौजूद एंटी-न्यूट्रिशनल फैक्टर्स कम हो जाते हैं. यह प्रक्रिया खेत या बगीचे में ताज़ा फसल के साथ की जाती है और प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ जाती है. आग के धुएं से दानों में एक खास ‘स्मोकी फ्लेवर’ आता है, जो मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ मिलकर इसे बेमिसाल बना देता है. स्वाद हल्का मीठे के साथ धुंआदार और मिट्टी जैसा होता है यह एक ऐसी लो-कॉस्ट प्रोसेसिंग है जिसमें बिना किसी मशीन के प्राकृतिक भोजन तैयार होता है.
गन्ने का रस और पुरानी यादें
विनीत तिवारी बताते हैं कि आज की पीढ़ी शायद इसका नाम तक नहीं जानती होगी. वे याद करते हैं कि कैसे पुराने समय में होरहा के साथ गन्ने का ताज़ा रस या मट्ठा पीना एक रिवाज था. गन्ने की मिठास और भुने हुए चने का चटपटा स्वाद (नमक और चटनी के साथ) शरीर को अद्भुत ठंडक और ऊर्जा देता था.
महज भोजन नहीं, आपसी जुड़ाव का जरिया
ग्रामीण भारत में इसे होरहा, हुरड़ा या बोड़िया जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. रबी की फसल के मौसम में खेत या बगीचों में होने वाली यह गतिविधि केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि कम्युनिटी बॉन्डिंग (आपसी मेलजोल) का बड़ा जरिया है. लोग एक साथ जुटते हैं, आग के सामने और अपनी जड़ों से जुड़ते हैं.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें