समस्तीपुर में एफपीओ से जुड़कर किसानों को राहत, अब 1400 में मिल रही 1850 की डीएपी

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एफपीओ के माध्यम से यही खाद लगभग 1400 रुपये में मिल रही है. इससे किसानों की लागत में सीधी कमी आई है और उन्हें ब्लैक मार्केट से खाद खरीदने की मजबूरी भी नहीं रह गई है. उजियारपुर प्रखंड के समथू गांव में संचालित एफपीओ इस दिशा में एक सफल उदाहरण बनकर उभरा है.

समस्तीपुर: बिहार के समस्तीपुर जिले में किसानों के लिए इन दिनों राहत भरी खबर सामने आ रही है. राज्य के कई हिस्सों में खाद की कमी और महंगे दामों को लेकर किसान परेशान रहते हैं. ऐसे में किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) से जुड़े किसानों को उर्वरक सस्ती दरों पर उपलब्ध हो रहा है. बाजार में डीएपी खाद की कीमत जहां करीब 1850 रुपये प्रति बैग तक पहुंच जाती है, वहीं एफपीओ के माध्यम से यही खाद लगभग 1400 रुपये में मिल रही है. इससे किसानों की लागत में सीधी कमी आई है और उन्हें ब्लैक मार्केट से खाद खरीदने की मजबूरी भी नहीं रह गई है. उजियारपुर प्रखंड के समथू गांव में संचालित एफपीओ इस दिशा में एक सफल उदाहरण बनकर उभरा है.

डीएपी खाद करीब 1400 रुपये प्रति बैग
इस पहल का सबसे अधिक लाभ छोटे और सीमांत किसानों को मिल रहा है. समथू गांव के किसान श्रवण कुमार बताते हैं कि पहले खाद खरीदना उनके लिए बड़ी चुनौती थी. समय पर खाद उपलब्ध नहीं होती थी और यदि मिलती भी थी तो महंगे दामों पर. लेकिन एफपीओ से जुड़ने के बाद स्थिति में काफी सुधार हुआ है. अब उन्हें डीएपी खाद करीब 1400 रुपये प्रति बैग मिल रही है, जिससे प्रति बैग लगभग 300 रुपये की बचत हो रही है.

खेती की लागत काफी कम
श्रवण कुमार लगभग ढाई से तीन बीघा जमीन पर खेती करते हैं और उनका कहना है कि इस बचत से उनकी खेती की लागत काफी कम हो गई है. इसके अलावा यूरिया खाद में भी उन्हें प्रति बोरा करीब 100 रुपये तक की बचत हो रही है. उनका कहना है कि एफपीओ से जुड़ने के बाद खेती को लेकर उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है.

सस्ती दर पर मिल रही है खाद
रामपुर समथू के किसान सुभाष चंद्र सिंह भी इस व्यवस्था से संतुष्ट हैं. वे आलू, मक्का और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते हैं. उनके अनुसार, पहले उर्वरक की व्यवस्था करना काफी मुश्किल होता था और बाजार में ऊंचे दाम तथा कालाबाजारी के कारण लागत बढ़ जाती थी. लेकिन पिछले एक वर्ष से एफपीओ से जुड़ने के बाद उन्हें खाद सस्ती दर पर मिल रही है, जिससे प्रति बैग 300 से 350 रुपये तक की बचत हो रही है.

खेती को भी एक नई दिशा मिली
किसानों का मानना है कि एफपीओ की इस पहल से न केवल उन्हें आर्थिक राहत मिल रही है, बल्कि खेती को भी एक नई दिशा मिल रही है. स्थानीय स्तर पर यह मॉडल अन्य किसानों को भी जोड़ने के लिए प्रेरित कर रहा है, जिससे क्षेत्र में सामूहिक खेती और आर्थिक मजबूती की नई संभावनाएं विकसित हो रही हैं.

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Amita kishor

न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें

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