Special Recipe: शहद, केसर और मिट्टी का जादू! जानिए कैसे शाही नुस्खा बना आज की प्रसिद्ध हैदराबादी कुल्फी

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Hyderabadi Matka Kulfi and Shahi Zafrani Tea Recipe: हैदराबाद के पुराने शहर में चारमीनार के आसपास की गलियों में मटका कुल्फी और शाही जाफरानी चाय सदियों पुरानी निज़ामी विरासत की पहचान हैं. कुल्फी और जाफरानी चाय का इतिहास मुगल काल और निज़ामों के दौर से जुड़ा है, जहां दूध को धीमी आंच पर पकाकर शहद और केसर से स्वाद बढ़ाया जाता था. मिट्टी के मटकों में जमाकर इसे परोसा जाता था. आज भी स्थानीय दुकानदार पुराने दम और मटका पद्धति का पालन करते हैं, ताकि पर्यटक और स्थानीय लोग शाही स्वाद का अनुभव ले सकें.

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हैदराबाद: चारमीनार के साये में बसे पुराने शहर की गलियों में सिर्फ इतिहास की गूँज ही नहीं, बल्कि उन जायकों की खुशबू भी रची-बसी है, जो कभी निज़ामों के शाही दस्तरख्वान की शान हुआ करते थे. आज जब हम हैदराबाद की सड़कों पर मटका कुल्फी और जाफरानी चाय का लुत्फ उठाते हैं, तो अनजाने में हम सदियों पुरानी एक ठंडी और स्वादिष्ट विरासत से जुड़ रहे होते हैं. पुराने शहर के जानकारों के अनुसार, कुल्फी का सफर मुगल काल में शुरू हुआ था, लेकिन हैदराबाद के निज़ामों के दौर में इसे एक नया और स्थानीय रंग मिला.

उस समय, जब बिजली से चलने वाले फ्रिज नहीं थे, निज़ाम के बावर्ची तपती गर्मी से निजात दिलाने के लिए एक अनोखा नुस्खा अपनाते थे. दूध को घंटों धीमी आंच पर पकाकर गाढ़ा किया जाता था, मिठास के लिए शुद्ध शहद और खुशबू व ठंडक के लिए केसर का उपयोग किया जाता था. यह मिश्रण मिट्टी के छोटे-छोटे मटकों में भरकर बर्फ और नमक के बीच दबाकर जमाया जाता था. मिट्टी के पोर्स से वाष्पीकरण होने के कारण मिश्रण न केवल जम जाता था, बल्कि उसमें मिट्टी की सोंधी महक भी समा जाती थी.

जाफरानी चाय का इतिहास भी निराला है

इसी तरह, चारमीनार के पास मिलने वाली मशहूर जाफरानी चाय का इतिहास भी निराला है. ईरानी प्रवासियों के साथ भारत आई दम चाय की संस्कृति में जब शाही रसोइयों ने केसर का तड़का लगाया, तो यह शाही जाफरानी चाय बन गई. केसर न केवल इसके सुनहरे रंग और स्वाद के लिए इस्तेमाल किया जाता था, बल्कि इसे स्वास्थ्यवर्धक गुणों वाला भी माना जाता था. आज चारमीनार के पास मिलने वाली कुल्फी और जाफरानी चाय उसी शाही परंपरा का आधुनिक अवतार हैं. हालांकि अब शहद की जगह चीनी और बड़े प्लांट में बनी बर्फ ने ले ली है, पर परोसने का तरीका और स्वाद का वह बेस आज भी वही है.

 नवाबी शान-ओ-शौकत की है जीवित दस्तावेज

स्थानीय दुकानदार बताते हैं कि वे अभी भी पुराने दम और मटका पद्धति का पालन करने की कोशिश करते हैं, ताकि पर्यटकों और स्थानीय लोगों को वही निज़ामी एहसास मिल सके.यह कहना गलत नहीं होगा कि हैदराबाद का यह खान-पान सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि शहर की गंगा-जमुनी तहजीब और नवाबी शान-ओ-शौकत का एक जीवित दस्तावेज़ है. मटका कुल्फी और शाही जाफरानी चाय आज भी हैदराबाद की गलियों की पहचान हैं, जो हर स्वाद और हर पीने वाले के दिल में इतिहास और संस्कृति की मिठास छोड़ते हैं.

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deep ranjan

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से News18 हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें

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