शब-ए-कद्र की फजीलत और विषम रातों की जानकारी | Shab-e-Qadr News

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हजार महीनों से अफजल है यह एक रात, जानें इबादत का सुन्नत तरीका और महत्व

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Shab-e-Qadr: रमजान का आखिरी अशरा शुरू होते ही शब-ए-कद्र की तलाश तेज हो गई है. हजार महीनों से बेहतर मानी जाने वाली इस रात में कुरान का अवतरण हुआ था. हाफिज सरवर अली खान के अनुसार 21वीं से 29वीं तक की विषम रातों में इबादत करने से एक हजार महीनों के बराबर सवाब मिलता है और फरिश्ते जमीन पर सलामती की दुआ लेकर उतरते हैं.

Shab-e-Qadr: इस्लाम के सबसे पाक महीने रमजान का मुबारक सफर अब अपने अंतिम पड़ाव यानी तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण अशरे में प्रवेश कर चुका है. ईद-उल-फितर के नजदीक आते ही मुस्लिम समुदाय के लोग इबादत में पूरी तरह डूब गए हैं. यह वह विशेष समय है जब अकीदतमंद मस्जिदों में ‘ऐतिकाफ’ (एकांतवास) में बैठकर और रातों को जागकर उस मुकद्दस रात की तलाश करते हैं. जिसे इस्लाम में ‘शब-ए-कद्र’ यानी ‘लैलतुल कद्र’ कहा गया है. कुरान और हदीस की रोशनी में इस एक रात की इबादत को 83 साल और 4 महीने यानी एक हजार महीनों की इबादत से भी अधिक श्रेष्ठ और अफजल माना गया है. यह रात खुदा की ओर से उम्मते-मोहम्मदी के लिए एक नायाब तोहफा है. जिसमें बंदों की दुआएं सीधे अर्श तक पहुँचती हैं.

इस्लामिक जानकार हाफिज सरवर अली खान के अनुसार शब-ए-कद्र की महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसी रात में अल्लाह ने पूरी इंसानियत के मार्गदर्शन के लिए पवित्र कुरान का ‘नुजूल’ यानी अवतरण शुरू किया था. कुरान के सूरह अल-कद्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ‘लैलतुल कद्र खैरूम मिन अल्फि शहर’. जिसका अर्थ है कि कद्र की रात एक हजार महीनों से बेहतर है. हाफिज जी ने हजरत मुजाहिद (रजि.) की एक रिवायत का जिक्र करते हुए बताया कि जब नबी करीम ﷺ ने बनी इस्राईल के एक ऐसे शख्स का जिक्र किया. जिसने हजार महीनों तक जिहाद किया था. तो सहाबा को लगा कि हम इतनी लंबी उम्र कहाँ पाएंगे. तब अल्लाह ने उम्मत को यह एक रात देकर उन्हें उससे भी अधिक सवाब कमाने का सुनहरा मौका दिया.

पाँच विषम रातों में तलाश का सुन्नत तरीका
धार्मिक उलेमाओं और जानकारों के मुताबिक शब-ए-कद्र को रमजान के आखिरी दस दिनों की विषम रातों में तलाशना चाहिए. यह रात 21वीं. 23वीं. 25वीं. 27वीं और 29वीं शब में से कोई भी एक हो सकती है. हालांकि भारतीय उपमहाद्वीप समेत दुनिया के कई हिस्सों में 27वीं रात को विशेष महत्व दिया जाता है. और इस रात को सबसे अधिक अफजल मानकर मस्जिदों और घरों में विशेष रोशनी व इबादत का इंतजाम किया जाता है. लेकिन सुन्नत और सही तरीका यही है कि इन पाँचों विषम रातों में जागकर अल्लाह की इबादत की जाए. ताकि इस मुबारक रात की बरकतें और रहमतें किसी भी सूरत में छूटने न पाएं. इन रातों में मुसलमान ‘शब-ख्वानी’ करते हैं और अपनी पिछली गलतियों के लिए तौबा करते हैं.

फरिश्तों का नुजूल और सलामती की दुआ
शब-ए-कद्र की एक और बड़ी विशेषता यह है कि इस रात को फरिश्ते और हजरत जिब्रील (अ़.) स्वयं जमीन पर उतरते हैं. वे पूरी दुनिया का भ्रमण करते हैं और सुबह होने तक उन खुशनसीब बंदों के लिए सलामती और मगफिरत (माफी) की दुआ करते हैं. जो नमाज. कुरान की तिलावत और तौबा-अस्तगफार में मशगूल रहते हैं. इस रात में की गई हर छोटी सी नेकी का सवाब कई गुना बढ़ जाता है. वातावरण में एक अजीब सी शांति और रूहानियत का अहसास होता है. जो सुबह सादिक होने तक जारी रहता है. यह रात अल्लाह की रहमत का ऐसा दरवाजा है. जो हर उस शख्स के लिए खुला है जो सच्चे दिल से अपने मालिक को याद करता है.

इबादत का सही तरीका और समाज के लिए दुआ
इस मुकद्दस रात का हक अदा करने के लिए केवल जागना काफी नहीं है. बल्कि रूहानी तौर पर खुद को संवारना जरूरी है. हाफिज सरवर अली खान ने बताया कि इस रात में ‘तहज्जुद’ और ‘सलातुल तस्बीह’ की नमाज का विशेष एहतमाम करना चाहिए. यह मौका है जब बंदा अपने गुनाहों की माफी मांगे और अपने मुल्क व कौम की तरक्की और सलामती की दुआ करे. कुरान को केवल पढ़ना नहीं बल्कि उसे समझकर अपने जीवन में उतारना ही इस रात का असल मकसद है. यह रात रहमतों को समेटने और अपनी तकदीर को संवारने का एक अवसर है. जो साल में केवल एक बार ही नसीब होता है. इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस रात की कद्र करे और अपनी रूहानी प्यास को बुझाए.

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vicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें

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