कुदरत का ‘डेथ वारंट’: परिंदे घोंसलों में ही दम तोड़ने लगे, समुद्र किनारे बिछ रहीं लाशें… कौन बचेगा और कौन खत्म होगा?

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कुदरत का डेथ वारंट! घोंसलों में ही दम तोड़ते परिंदे… कौन बचेगा, कौन खत्म होगा?

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Extreme Heat Warning: ग्लोबल वार्मिंग के चलते दुनिया के कई हिस्से बार-बार भीषण हीटवेव झेल रहे हैं. जलवायु में आए इस बदलाव ने इकोसिस्टम के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. हालिया रिसर्च से पता चला है कि अचानक बढ़ने वाला तापमान कई प्रजातियों को संभलने का मौका नहीं देता. जहां चलने-फिरने वाले जीव छाया की तलाश में बच निकलते हैं, वहीं समुद्री जीव और पेड़-पौधे भारी नुकसान झेल रहे हैं. वेस्टर्न कनाडा के डेटा के आधार पर वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि भविष्य में केवल वही प्रजातियां बचेंगी जो खुद को बदल सकेंगी. आइए, जानते हैं कि गर्मी के इस कहर से कौन बचेगा और कौन मारा जाएगा!

जब तापमान धीरे-धीरे बढ़ता है, तो प्रकृति और उसके जीवों को खुद को ढालने का समय मिल जाता है. लेकिन जब भीषण गर्मी यानी हीटवेव अचानक हमला करती है, तो इसके परिणाम तत्काल और विनाशकारी होते हैं. हाल ही में वेस्टर्न कनाडा और उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों में आई ‘हीट डोम’ जैसी घटनाओं ने वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है. इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने तापमान को उस स्तर पर पहुंचा दिया, जिसे कई प्रजातियां बर्दाश्त नहीं कर सकीं. (AI Photo)

यूनिवर्सिटी ऑफ विक्टोरिया की डॉक्टर जूलिया बॉम और उनकी टीम ने इस तबाही का बारीकी से अध्ययन किया है. उनकी रिसर्च बताती है कि गर्मी का एक छोटा सा झोंका भी पूरे इकोसिस्टम को तहस-नहस कर सकता है. समुद्र के किनारों पर पड़े मरे हुए शेल, झुलसे हुए फल और पेड़ों से गिरते हुए पक्षियों के बच्चे इस बात का सबूत हैं कि हम एक बड़े पर्यावरणीय संकट के मुहाने पर खड़े हैं. (AI Photo)

डॉक्टर बॉम के रिसर्च पेपर के मुताबिक, इस भीषण गर्मी के दौरान सर्वाइवल का सबसे बड़ा फैक्टर ‘मूवमेंट’ रहा. जो जीव गर्मी महसूस होते ही छायादार इलाकों, बिलों या ठंडी जगहों पर जाने में सक्षम थे, वे बच गए. लेकिन जो जीव एक ही जगह स्थिर रहते हैं, जैसे कि पेड़ या समुद्री घोंघे, उनके लिए यह गर्मी काल बन गई. रिसर्च में पाया गया कि सीधे धूप के संपर्क में रहने वाले जानवरों और पौधों की संख्या में भारी गिरावट आई. यह डेटा एक छिपे हुए बंटवारे को दिखाता है- एक तरफ वे जो गर्मी से भाग सकते थे और दूसरी तरफ वे जो उस तपती भट्टी में फंसकर रह गए. (Photo : Reuters)

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जब समुद्र में कम ज्वार (Low Tide) होता है, तो किनारे पर रहने वाले जीव सीधे सूरज की रोशनी के संपर्क में आ जाते हैं. इनके पास भागने का कोई रास्ता नहीं होता. रिसर्च में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. ‘बे मसल्स’ यानी एक प्रकार के समुद्री जीवों की मृत्यु दर 92 प्रतिशत तक पहुंच गई. आधे से ज्यादा ‘बार्नेकल्स’ यानी कड़े खोल वाले जीव मर गए. समुद्री घास के खत्म होने से वहां का पूरा फूड चेन बिगड़ गया. चूंकि ये प्रजातियां दूसरे जीवों के लिए घर और भोजन का काम करती हैं, इसलिए उनकी मौत का मतलब था कि उनसे जुड़े कई और जीव भी अब संकट में हैं. (Photo : Reuters)

हैरानी की बात यह है कि उड़ने वाले पक्षी, जो कहीं भी जा सकते हैं, वे भी इस हीटवेव का शिकार हुए. समस्या उनकी लाइफ स्टेज यानी जीवन के पड़ाव की थी. रिसर्च के दौरान पाया गया कि कई युवा पक्षी अपने घोंसलों में ही मर गए क्योंकि वे उड़ने लायक बड़े नहीं हुए थे. घोंसलों के भीतर का तापमान इतना बढ़ गया कि वे उसे झेल नहीं सके. इसी तरह, ब्लूबेरी एफिड्स जैसे छोटे कीड़े, जो पहले 50 प्रतिशत पौधों पर मौजूद थे, हीटवेव के बाद 100 में से सिर्फ 1 पौधे पर ही बचे मिले. बड़ी संख्या में समुद्री बत्तख और कारिबू जैसे बड़े जानवरों की संख्या में भी 50 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई. (Photo : Reuters)

पेड़-पौधों का मामला थोड़ा अलग और दिलचस्प रहा. वैज्ञानिकों ने ‘ग्रॉस प्राइमरी प्रोडक्टिविटी’ यानी पौधों द्वारा कार्बन सोखने की क्षमता की जांच की. डेटा से पता चला कि गर्मी ने हर जगह एक जैसा असर नहीं डाला. ठंडे और गीले इलाकों में पौधों ने सामान्य से 30 प्रतिशत ज्यादा कार्बन सोखा, क्योंकि वहां उन्हें पर्याप्त पानी मिल रहा था. लेकिन गर्म और सूखे इलाकों में यही क्षमता 75 प्रतिशत तक गिर गई. इससे यह साफ हो गया कि हीटवेव के दौरान पौधों के बचने के लिए केवल तापमान ही नहीं, बल्कि पानी की उपलब्धता सबसे जरूरी फैक्टर है. (AI Photo)

पहाड़ों पर जमा बर्फ और ग्लेशियर इस हीटवेव के कारण बहुत तेजी से पिघले. इसके चलते नदियों और झरनों में पानी का बहाव समय से पहले 40 प्रतिशत तक बढ़ गया. सुनने में यह अच्छा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी मुसीबत छिपी है. जब सारा पानी जून-जुलाई की शुरुआत में ही बह गया, तो अगस्त आते-आते ये नदियां सूखने लगीं. ठंडे पानी पर निर्भर रहने वाली मछलियां जैसे ‘सैल्मन’ और जलीय कीड़ों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हुई. समय से पहले पिघला हुआ पानी भविष्य के सूखे का संकेत दे रहा है. (Photo : Reuters)

भीषण गर्मी ने जंगलों में मौजूद घास और लकड़ियों को बारूद की तरह सुखा दिया. हीटवेव शुरू होते ही जंगलों में आग लगने की घटनाएं 37 प्रतिशत बढ़ गईं. लेकिन असली धमाका उसके अगले हफ्ते हुआ, जब आग की घटनाओं में 395 प्रतिशत का भारी उछाल आया. इन आगों ने न केवल पेड़ों को जलाया, बल्कि उस मिट्टी को भी कमजोर कर दिया, जिससे बाद में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ गया. कई इलाकों में तो पुरानी प्रजातियों की जगह नई आक्रामक प्रजातियों ने ले ली, जिससे वहां का पूरा नक्शा ही बदल गया.

डॉक्टर बॉम का कहना है कि यह रिसर्च एक चेतावनी है. सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि किसी को इस हीटवेव का अंदाजा नहीं था, इसलिए वैज्ञानिकों ने जो कुछ भी डेटा जुटाया, वह पहले से चल रहे रिसर्च के आधार पर था. अब जरूरत है एक ऐसे ‘मॉनिटरिंग नेटवर्क’ की, जो आने वाले खतरों का पहले ही अलर्ट दे सके. हमें उन जगहों को सुरक्षित करना होगा जहां जीव गर्मी से बचने के लिए शरण ले सकें. अगर हमने समय रहते पानी के स्रोतों और छायादार जंगलों को नहीं बचाया, तो आने वाले सालों में धरती से कई खूबसूरत प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएंगी.

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