‘गुजारिश’ से ‘सलाम वेंकी’ तक, जब इच्छा मृत्यु पर छिड़ी बहस, पर्दे पर बयां हुई लाइलाज बीमारी का दर्द

Share to your loved once


Last Updated:

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की अनुमति दिए जाने के बाद यह संवेदनशील मुद्दा फिर चर्चा में है. भारतीय सिनेमा ने ‘शायद’, ‘गुजारिश’ और ‘सलाम वेंकी’ जैसी फिल्मों के जरिए इस मुद्दे को गहराई से उभारा गया है. ये फिल्में लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीजों की पीड़ा, उनके स्ट्रगल और गरिमा के साथ मरने के अधिकार पर सवाल उठाती हैं. अरुणा शानबाग केस पर बनी डॉक्यूमेंट्रीज ने भी इस कानून को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है.

ख़बरें फटाफट

'गुजारिश' से 'सलाम वेंकी' तक, जब इच्छा मृत्यु पर छिड़ी बहसZoom

फिल्मों ने लोगों पर गहरी छाप छोड़ी है.

नई दिल्ली: इच्छा मृत्यु हमेशा से वाद-विवाद होता रहा है, जिसे हम ‘यूथेनेशिया’ भी कहकर बुलाते हैं. यह हमेशा से एक ऐसा विषय रहा है जिस पर समाज और कानून के बीच लंबी बहस चलती आई है. अब जब सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 से कोमा में चल रहे हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत दी, तो यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया. भारतीय सिनेमा ने भी समय-समय पर इस बेहद संवेदनशील और इमोशनल टॉपिक को पर्दे पर उतारा है. फिल्मों के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई है कि जब कोई इंसान ऐसी लाइलाज बीमारी या दर्द से गुजर रहा हो जहां से वापसी मुमकिन न हो, तो क्या उसे गरिमा के साथ मौत चुनने का हक मिलना चाहिए? इन फिल्मों ने न सिर्फ कानूनी पेचीदगियों को दिखाया, बल्कि उस मरीज और उसके परिवार के मानसिक और इमोशनल स्ट्रगल को भी बखूबी पेश किया.

विषय पर सबसे पहली और अहम फिल्म साल 1979 में आई ‘शायद’ मानी जाती है. मदन बावरिया के निर्देशन में बनी इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी जैसे दिग्गज कलाकार थे. फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी जो असहनीय दर्द से जूझ रहा था और समाज से सवाल करता था कि क्या उसे जबरदस्ती जिंदा रहने पर मजबूर करना सही है? इसके दशकों बाद, 2010 में संजय लीला भंसाली की ‘गुजारिश’ आई, जिसने इस बहस को घर-घर तक पहुंचा दिया. ऋतिक रोशन ने इसमें एक ऐसे जादूगर का किरदार निभाया जो लकवे का शिकार हो जाता है और अपनी मर्जी से मरने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है. ऐश्वर्या राय और ऋतिक की अदाकारी ने दिखाया कि एक काबिल इंसान के लिए लाचारी की जिंदगी कितनी बोझिल हो सकती है.

‘सलाम वेंकी’ ने की आंखें नम
सिनेमा का यह सफर यहीं नहीं रुका, साल 2022 में आई फिल्म ‘सलाम वेंकी’ ने एक सच्ची घटना के जरिए लोगों की आंखें नम कर दीं. काजोल और विशाल जेठवा स्टारर फिल्म एक युवा की कहानी थी जो एएलएस नाम की गंभीर बीमारी से लड़ते हुए अपनी मौत का हक मांगता है. फिल्मों के साथ-साथ ‘पैसिव यूथेनेशिया-कहानी करुणा की’ जैसी डॉक्यूमेंट्रीज ने अरुणा शानबाग जैसे ऐतिहासिक मामलों पर रौशनी डाली, जिसकी वजह से भारत में पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता मिली. ये तमाम फिल्में हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि जीवन सिर्फ सांस लेने का नाम नहीं है, बल्कि उसमें गरिमा का होना भी उतना ही जरूरी है. आज के कानूनी फैसलों के बैकग्राउंड में फिल्में और भी ज्यादा असरदार हो गई हैं.

About the Author

Abhishek Nagar

अभिषेक नागर News 18 Digital में Senior Sub Editor के पद पर काम कर रहे हैं. वे News 18 Digital की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. वे बीते 6 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे News 18 Digital से पहल…और पढ़ें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

GET YOUR LOCAL NEWS ON NEWS SPHERE 24      TO GET PUBLISH YOUR OWN NEWS   CONTACT US ON EMAIL OR WHATSAPP