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Famous Peda of Chapra: छपरा के आम दाढ़ी ढाला का पेड़ा आज बिहार और यूपी के लोगों की पहली पसंद बन चुका है. पिछले 50 वर्षों से कोयले की आग और शुद्ध दूध से तैयार होने वाली यह मिठाई अपनी शुद्धता और सोंधेपन के लिए मशहूर है. महज ₹10 में मिलने वाले इस जादुई स्वाद के पीछे की क्या है कहानी और कैसे यह दर्जनों परिवारों के लिए रोजगार का जरिया बना है, पढ़ें विशाल कुमार की यह विशेष रिपोर्ट.
छपरा: बिहार का सारण जिला न केवल अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां के जायके भी दूर-दराज तक प्रसिद्ध हैं. छपरा की मिठाइयां अपने अनूठे स्वाद के कारण आज बिहार, पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी अपनी एक खास पहचान बना चुकी हैं. ग्रामीण क्षेत्रों के बाजारों में मिलने वाली यह मिठाई शुद्धता की खास मिसाल पेश करती है. इसको बनाने का तरीका भी खास है. आइए जानते हैं इसकी खासियत.
आम दाढ़ी ढाला, पेड़ा प्रेमियों का पसंदीदा ठिकाना
जब भी लोगों को असली और पारंपरिक पेड़े का स्वाद चखने का मन होता है. तो उनकी मंजिल जिले का आम दाढ़ी ढाला चौक होता है. यहां मिलने वाला पेड़ा इतना स्वादिष्ट और शुद्ध है कि इसे चखने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से लोग खिंचे चले आते. इस चौक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मुख्य रूप से पेड़ा और चाय की ही दुकानें हैं. जो दशकों से अपनी गुणवत्ता के लिए जानी जाती हैं.
कोयले की आग और शुद्ध दूध का कमाल
इन दुकानों की सफलता का राज इनकी पारंपरिक निर्माण विधि है. यहां पेड़ा बनाने के लिए आज भी आधुनिक मशीनों के बजाय कोयले की आग का उपयोग किया जाता है. दुकानदार बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों से ताजा दूध मंगाया जाता है. जिसे घंटों तक कोयले की धीमी आग पर जलाकर शुद्ध खोवा तैयार किया जाता है. इसके बाद पूरी शुद्धता के साथ पेड़ा बनाया जाता है. यही धीमी आंच का जादू है जो पेड़े को वो सोंधापन और बेहतरीन स्वाद देता है. जो आजकल की मिलावटी मिठाइयों में नामुमकिन है.
कीमत और बिक्री का गणित
शुद्धता के साथ-साथ यह पेड़ा आम आदमी की जेब के अनुकूल भी है. यहां ₹360 प्रति किलो की दर से पेड़ा बेचा जाता है. जबकि फुटकर में एक पीस की कीमत मात्र 10 रुपये है. लोकप्रियता का आलम यह है कि प्रत्येक दुकान से प्रतिदिन औसतन 90 किलो से लेकर एक क्विंटल तक पेड़े की बिक्री हो जाती है. ताजा पेड़ा होने के कारण शाम ढलने से पहले ही स्टॉक खत्म हो जाता है.
40 वर्षों से नहीं बदला स्वाद, ग्राहक की जुबानी
स्थानीय निवासी कमलदेव प्रसाद ने लोकल 18 को बताया कि वे पिछले 40 वर्षों से यहां का पेड़ा खा रहे हैं. उनके अनुसार जो स्वाद उन्हें चार दशक पहले मिलता था. वही गुणवत्ता और शुद्धता आज भी बरकरार है. दुकानदार पूरी ईमानदारी के साथ बिना किसी मिलावट के मिठाई तैयार करते हैं. यही वजह है कि यहाँ ग्राहकों का अटूट विश्वास बना हुआ है.
रोजगार का बड़ा जरिया
यह व्यवसाय केवल स्वाद तक सीमित नहीं है. बल्कि यह क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है. एक-एक दुकान से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 20 से 25 लोग जुड़े हुए हैं. कोई दूध की आपूर्ति करता है तो कोई मिठाई बनाने में मदद करता है. इस तरह एक छोटे से चौक की इन दुकानों से दर्जनों परिवारों का चूल्हा जल रहा है. यह मिठाई न केवल जिले का मान बढ़ा रही है. बल्कि उत्तर प्रदेश तक बिहार की मिठास को भी पहुंचा रही है.
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