‘पुआ बिना होली जैसे बिना रंग टोली”, दुनिया की पहली मिठाई मालपुआ की रोचक कहानी

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होली के मौके पर उत्तर भारत खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में एक कहावत बहुत मशहूर है – “पुआ बिना होली जैसे बिना रंग टोली.” होली पर उत्तर भारत में आमतौर पर घर घर में मालपुआ बनाया जाता है. खाने में खैर इसकी मिठास और लिज्जत के कहने ही क्या. इसका रेशमी कोमल अहसास. जीभ पर जाकर घुल जाने की अदा. शादी के बाद जब बहू घर आती है तो बिहार और यूपी में उससे सबसे पहले मालपुआ ही बनवाया जाता है. ये जितना मधुर और स्वादिष्ट है, उतनी ही रोचक है इसकी कहानी भी. कहा जाता है ये दुनिया को भारत की सबसे मीठी देन है.

‘मालपुआ’ का मतलब माल और पुआ. माल मतलब समृद्ध या उत्तम सामग्री. पुआ संस्कृत के शब्द अपूपा से निकला, क्योंकि पहले इसे अपूपा ही कहते थे. मालपुआ भारत में 3000 ईसा पूर्व से बन रहा है. वैदिक काल में ये और निखरा. फिर मुगलों के आने के बाद ड्राइफ्रूट्स के साथ मधुर बना. इसका संबंध होली के समय कटकर आई गेहूं और जौ की नई फसल से भी है. ऋग्वेद में इसका जिक्र मिलता है. पुराने समय में मालपुआ इतना शुभ माना जाता था कि बेटी की विदाई या नए घर के प्रवेश पर इसे ‘शगुन’ के रूप में खिलाया जाता था.

कई खाद्य इतिहासकार मानते हैं कि भारत का ‘अपूपा’ यानि मालपुआ दुनिया के सबसे पुराने ‘पैनकेक्स’ में एक है. जब रोम के लोग ‘एलिबाके’ या फ्रांसीसी ‘क्रेप्स’ बना रहे थे, तब भारत में मालपुआ अपनी पूरी महिमा के साथ मौजूद था. कुछ लोग तो इसे दुनिया का पहला पैनकेक भी कहते हैं.

तो सवाल ये है कि होली पर इसे क्यों जरूर बनाते हैं. इसके पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक यानि आयुर्वेदिक तीनों वजहें हैं. वसंत ऋतु में नया अनाज आता है. सर्दियां जा रही होती हैं. तब इसे नई फसल के स्वागत में बनाकर देवताओं को समर्पित किया जाता है. चूंकि इसी मौसम में होली झूमकर आती है तो ये इस रंगबिरंगे त्योहार की रौनक बनता है.

क्यों ये होली पर खास पकवान

मालपुआ मुख्य रूप से गेहूं के आटे या सूजी से बनता है. आयुर्वेद कहता है कि दो ऋतुओं के संधिकाल में ये शरीर के सिस्टम को दुरुस्त कर देता है. इस समय शरीर में ‘कफ’ की अधिकता होती है. पाचन शक्ति थोड़ी सुस्त पड़ जाती है. मालपुआ में सौंफ, काली मिर्च और इलायची का भरपूर प्रयोग किया जाता है, लिहाजा ये मसाले पाचन में मदद करते हैं. शरीर को बदलते मौसम के अनुसार ढलने की शक्ति देते हैं. घी, गुड़ – चीनी शरीर को तुरंत ऊर्जा देते हैं. होली खेलने के बाद जो थकान होती है, वो इससे गायब हो जाती है.

किसने किया इसका आविष्कार

वैसे मालपुआ के आविष्कार का श्रेय किसी एक व्यक्ति या राजा को नहीं दिया जा सकता. ये ‘विकासवादी व्यंजन’ है. हजारों सालों में धीरे-धीरे विकसित हुआ. तब इसके आविष्कार का श्रेय प्राचीन भारत के आर्यों को जाता है. भारत में अलग अलग जगह ये अलग तरीकों से भी बनता है. राजस्थान में केसरी चासनी में डूबे हुए ‘रबड़ी मालपुआ’ का रिवाज है. ब्रज क्षेत्र में मालपुआ से भगवान कृष्ण को भोग दिया जाता है. इसे अक्सर ‘खीर’ के साथ परोसा जाता है.

भगवान जगन्नाथ रात में सोते समय इसे खाते हैं

मालपुआ पुरी में भगवान जगन्नाथ के ‘छप्पन भोग’ का मुख्य हिस्सा है. इसे ‘अमलु’ कहा जाता है. कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ जब रात में सोने जाते हैं तो ये रात में उनका अंतिम भोग होता है. मंदिर की रसोई में इसे बहुत ही पारंपरिक तरीके से बनाया जाता है.

बिहार और यूपी में मालपुआ केले और दूध के साथ बनाते हैं. बंगाल में इसके बैटर में अक्सर सौंफ और नारियल डालते हैं. इसकी तासीर गर्म और ऊर्जा देने वाली होती है. मालपुआ की कहानी बताती है कि कैसे एक साधारण जौ का पैनकेक हजारों सालों में विकसित होकर एक शाही मिठाई बन गया.

ये भी कहा जाता है कि केवल होली के समय ही नहीं बल्कि मानसून के मौसम में भी में ये प्रिय व्यंजन होता . जब पुराने जमाने में बारिश के कारण बाहर जाना मुश्किल होता था, तब घर की महिलाएं घी, गुड़ और आटे से मालपुआ बनाती थीं. इसकी खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती थी. बंगाल में इसे लेकर ये धारणा है कि अगर कोई मेहमान घर आए. उसे मालपुआ न खिलाया जाए, तो घर की बरकत कम हो जाती है. इसीलिए बंगाल में संक्रांति और दुर्गा पूजा के दौरान हर घर में मालपुआ विशेषकर केले वाला निश्चित रूप से बनता है.

पहला मालपुआ कैसे बना होगा

पहला मालपुआ कैसे बना होगा. इतिहासकारों और खाद्य विशेषज्ञों का मानना है कि मालपुआ का जन्म एक प्रयोग के तौर पर ही हुआ होगा. प्राचीन काल में जौ मुख्य अनाज था. दूध की बहुतायत थी. जब इंसानों ने अनाज को पीसकर उसमें दूध मिलाया, तो एक घोल तैयार हुआ. इसे मीठा करने के लिए शहद का इस्तेमाल हुआ.

शुरुआत में इसे शायद पत्थर की गरम सिल्लियों पर सेंका गया होगा. बाद में जब घी का उपयोग बढ़ा, तो इसे तलने की प्रक्रिया शुरू हुई. घी में तलने से इसकी शेल्फ-लाइफ बढ़ गई.

फिर कैसे बदलता गया

बौद्ध और मौर्य काल में ये कुछ बदला, इसमें चावल के आटे और तिल का प्रयोग होने लगा. मध्यकाल में इसमें गुड़ की जगह चीनी और दूध खोया का इस्तेमाल शुरू हुआ. ये समय के साथ ज्यादा लजीज और नरम होता चला गया. जब मुगल आए तो उनके रसोई घर में इसमें अंडा या मावा डालने की परंपरा भी शुरू हुई, जिससे इसका स्वाद बढ़ाया जा सके.

अकबर के शासनकाल के दौरान शाही रसोइयों ने मध्य एशियाई ‘क्रेप्स’ और भारतीय अपूपा को मिलाकर एक नया रूप दिया. वो इसे शाही टुकड़ा कहते थे.
कहा जाता है कि नूरजहां को केसर और गुलाब जल में डूबे हुए बेहद पतले मालपुए पसंद थे, जिन्हें चांदी के वर्क के साथ परोसा जाता था.

मुंबई का कड़ाही के आकार का मालपुआ

इन दिनों रमज़ान चल रहा है. अगर आप इन दिनों मुंबई के ‘मोहम्मद अली रोड’ पर चले जाएं, तो अलग ही नज़ारा दिखेगा. यहां के मालपुआ अपने बड़े आकार से फेसम हैं. ये एक बड़ी कड़ाही के आकार के बराबर यानि 12-15 इंच चौड़े होते हैं. इन्हें पीले और नारंगी रंगों में बनाया जाता है. इनके ऊपर मलाई की मोटी परत डाली जाती है. ये मुम्बई की इफ्तार संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है.

बिहार और यूपी में मालपुआ की रैसिपी

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आमतौर पर इसे पुआ कहा जाता है. यहां के पुआ की खासियत यह है कि इसे चाशनी में नहीं डुबोया जाता, बल्कि मिठास को घोल के अंदर ही मिला दिया जाता है. इसमें केला डालना जरूरी माना जाता है, जो इसे अंदर से बेहद नरम और बाहर से कुरकुरा बनाता है.

पारंपरिक और प्रामाणिक रेसिपी
सामग्री मैदा (या गेहूं का आटा)2 कप, चीनी1 कप (स्वादानुसार), दूध 2-3 कप (घोल बनाने के लिए), पका हुआ केला2, बड़े सौंफ का 1 बड़ा चम्मच, सूखा नारियल (कद्दूकस)½ कप, इलायची पाउडर1 छोटा चम्मच, ड्राई फ्रूट्स (काजू, किशमिश)बारीक कटे हुए, घी या तेल तलने के लिए.

बनाने की विधि
– घोल तैयार करके बड़े बर्तन में मैदा और चीनी मिलाएं.
– अब इसमें धीरे-धीरे दूध डालते हुए फेंटें
– घोल न तो बहुत पतला होना चाहिए और न ही बहुत गाढ़ा. ये धार की तरह गिरने वाला होना चाहिए.
– एक अलग बाउल में पके हुए केलों को पूरी तरह मैश कर लें,इस केले के पेस्ट को तैयार घोल में डाल दें. केला प्राकृतिक मिठास और ‘स्पंजी’ टेक्सचर देगा.
– अब इसमें सौंफ, कद्दूकस किया हुआ नारियल, इलायची पाउडर और कटे हुए मेवे डालें.
– इस घोल को कम से कम 2 से 3 घंटे के लिए ढककर छोड़ दें.
– चीनी पूरी तरह घुल जाएगी और पुआ फूलेगा.
– कड़ाही में घी या तेल गरम करें. आंच ‘मीडियम’ रखें.
– एक कलछी भरकर घोल को कड़ाही के बीच में डालें. यह अपने आप गोल आकार ले लेगा.जब पुआ ऊपर तैरने लगे और किनारे सुनहरे होने लगे, तो इसे पलट दें.इसे दोनों तरफ से सुनहरा भूरा होने तक तलें. फिर इसे तेल निकालते हुए निकाल लें. बन गया मालपुआ.

बिहार के पुआ में सौंफ की खुशबू ही इसकी पहचान है, इसे बिल्कुल न छोड़ें.बिहार में होली के दिन इसे मसालेदार कटहल की सब्जी या आलू-दम के साथ खाया जाता है. तो मीठे और तीखे का मेल मिलता है.

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