कोकून बैंक पर प्रशासन के बड़े दावे, लेकिन बुनकरों को अब तक नहीं मिली राहत, जानिए जमीनी हकीकत
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भागलपुर जिलाप्रशासन के द्वारा कोकून बैंक की स्थापना किया था. लेकिन जब इसको लेकर बुनकरों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि अगर कोकून बैंक बन जाता तो बुनकरों के दिन संवर जाते. ये सब सिर्फ कागजों पर बना होगा बुनकरों को पता तक नहीं है.
भागलपुर सिल्क सिटी के नाम से जाना जाता है यहां का सिल्क देश ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ब है. हालिया दिनों में इसकी स्थिति बिगड़ी है. बाजार खत्म हो गए हैं. इसके पीछे के कई कारण है जिसने बुनकरों की कमर तोड़ दी है. इसका सबसे बड़ा कारण एक धागा भी है जिसे बुनकरों की रीढ़ की हड्डी कही जाती है अब उसी को खत्म कर दिया गया है जिससे बुनकर परेशान हो रहे हैं.
जिलाप्रशासन के द्वारा बुनकरों को लेकर कई दावे किए गए. लेकिन ये दावे धरातल पर नजर नहीं आते हैं. न ही इसका लाभ बुनकरों को मिल पाता है. जिलाप्रशासन के द्वारा कोकून बैंक की स्थापना कि बात कही गयी थी लेकिन जब इसको लेकर बुनकरों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि अगर कोकून बैंक बन जाता तो बुनकरों के दिन संवर जाते. ये सब सिर्फ कागजों पर बना होगा बुनकरों को पता तक नहीं है.
कोकून बैंक की होनी थी स्थापना हकीकत क्या
सच मे अगर कोकून बैंक खोल दिया जाए तो एक बार फिर बुनकर पहले की स्थिति में आ जाएगा. कपड़ा बनने के लिए सबसे पहले धागे की जरूरत पड़ती है, उसी की कालाबाजारी हो रही है तो कपड़े की कीमत आसमान छुए गा ही. अभी धागा सिर्फ पूंजीपतियों के पास जब मन होता है तब दाम बढ़ा दिया जाता है. ऐसे में बुनकर कैसे उत्थान करेगा. पहले यहां बुनकर यहां खुद से धागा तैयार किया करते थे लेकिन अब वो खत्म हो गया. अगर कोकून बैंक सच मे खुल जाए तो बुनकरों का पलायन रुकेगा.
पहले यहां होता था शहतूत का बगीचा
पहले यहां पर शहतूत का बगीचा हुआ करता था. जिसपर रेशमी कीड़े का पालन होता था यहां की महिलाएं अपने जांघ पर इससे धागा तैयार करती थी. लेकिन धीरे धीरे सब खत्म हो गया. अब फिर से आस जगी है प्रशासन के तरफ से अगर सच मे कोकून बैंक बुनकर क्षेत्र में लगाए और इसका संचालन सही तरीके से करें तो बुनकरों का उत्थान जो जाएगा.