तालाबों से हटेगा कब्जा, पार्कों में नहीं बिछेगा कंक्रीट, अब गाजियाबाद में बिना रेन वाटर हार्वेस्टिंग के नहीं बनेगा घर, जानें निर्माण से जुड़े नए नियम

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Rain Water Harvesting Rules Ghaziabad: गाजियाबाद जिले में तेजी से गिरते भूजल स्तर ने प्रशासन ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार तक की नींद उड़ा दी है. अब शहर में कंक्रीट के जंगल तो खड़े होंगे, लेकिन पानी की कीमत पर नहीं. जी हां… अब कंक्रीट का जंगल (बड़ी-बड़ी बिल्डिंग) खड़ा करने से पहले आपको आसमान से बरसने वाली हर बूंद का हिसाब देना होगा. दरअसल, सरकार का साफ संदेश है ‘कैच द रेन, फिर निर्माण’. यानी अब बारिश की एक-एक बूंद को सहेजने का इंतजाम पहले करना होगा और निर्माण की ईंट बाद में रखी जाएगी. आइए जानते हैं कि इन नए नियमों से आपकी जेब, आपके घर और आपके शहर की सेहत पर क्या असर पड़ेगा.

बारिश की हर बूंद बचाना अब विकल्प नहीं, मजबूरी है
गाजियाबाद, जो एक तरफ औद्योगिक विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है, वहीं दूसरी ओर गहरे जल संकट की कगार पर खड़ा है. इसी संकट को भांपते हुए उत्तर प्रदेश शासन के प्रमुख सचिव पी. गुरुप्रसाद ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) सहित प्रदेश के सभी आवास आयुक्तों को कड़े निर्देश जारी किए हैं. गुरुप्रसाद ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि रेन वॉटर हार्वेस्टिंग अब केवल कागजी खानापूर्ति नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त होगी.

गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) और प्रदेश के सभी आवास आयुक्तों को इन नियमों का कड़ाई से पालन कराने को कहा गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शासन ने साफ शब्दों में कहा है कि ‘कैच द रेन’ अभियान के तहत हर बूंद को जमीन के भीतर पहुंचाना ही एकमात्र लक्ष्य है.

300 वर्ग मीटर से बड़े मकानों के लिए क्या है नियम?
नए नियमों के अनुसार, गाजियाबाद में यदि आप 300 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले भूखंड पर घर बना रहे हैं, तो आपको रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना ही होगा. यह अब बिल्डिंग पास कराने की पहली शर्त होगी. नए नियमों के अनुसार:

  • अनिवार्य हार्वेस्टिंग: 300 वर्ग मीटर से बड़े सभी निजी मकानों में हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अब जरूरी होगा.
  • छोटे प्लॉट के लिए राहत: 100 से 300 वर्ग मीटर के प्लॉट धारकों को एक छोटी राहत दी गई है. यदि वे ऐसी कॉलोनी में रह रहे हैं जहां पहले से ‘कलेक्टिव रिचार्ज नेटवर्क’ (सामूहिक हार्वेस्टिंग सिस्टम) मौजूद है, तो उन्हें अलग से सिस्टम लगाने की जरूरत नहीं होगी.
  • ग्रुप हाउसिंग और बड़े भवन: सामूहिक नेटवर्क न होने की स्थिति में 300 मीटर से ऊपर के सभी भवनों (ग्रुप हाउसिंग सहित) को अपनी छत पर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाना ही होगा.

निर्माण कार्य में पीने के पानी पर पाबंदी, ट्रीटेड वेस्ट वॉटर का होगा इस्तेमाल
अक्सर देखा गया है कि निर्माण कार्यों में लाखों लीटर पीने योग्य मीठा पानी बर्बाद कर दिया जाता है. भवन निर्माण एवं विकास उपविधि-2025 के हवाले से शासन ने निर्देश दिया है कि अब कंस्ट्रक्शन साइट्स पर केवल ‘उपचारित अपशिष्ट जल’ (Treated Waste Water) का ही उपयोग किया जाएगा. इससे न केवल पीने के पानी की बचत होगी, बल्कि सीवेज के पानी का भी सही प्रबंधन हो सकेगा.

बड़ी टाउनशिप और बिल्डर्स के लिए ‘1% का फॉर्मूला’
10 एकड़ से बड़ी आवासीय योजनाओं या कॉलोनियों के लिए नियम और भी सख्त हैं. ऐसी कॉलोनियों के कुल क्षेत्रफल का कम से कम 1 फीसदी हिस्सा जलाशय या तालाब के लिए आरक्षित रखना होगा. इन जलाशयों की गहराई कम से कम 2 मीटर रखनी होगी ताकि वे सुरक्षित रहें और केवल वर्षा जल के संग्रहण के लिए इस्तेमाल हों. इतना ही नहीं, यह भी सुनिश्चित करना बिल्डर की जिम्मेदारी होगी कि हार्वेस्टिंग सिस्टम में केवल छतों का साफ पानी जाए, न कि सीवेज या दूषित पानी.

औद्योगिक और शिक्षण संस्थानों पर रहेगी विशेष नजर
बता दें, मुरादनगर और मोदीनगर जैसे एजुकेशन हब और गाजियाबाद के औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी विशेष गाइडलाइंस जारी की गई हैं. नई गाइडलाइंस के मुताबिक, जिन औद्योगिक शेड, अस्पतालों या शिक्षण संस्थानों का निर्माण क्षेत्र 20,000 वर्ग मीटर से अधिक है, उन्हें हर 5,000 वर्ग मीटर पर कम से कम एक रिचार्ज बोर बनाना होगा.

इतना ही नहीं, संस्थानों को अपनी एक दिन की कुल पानी की जरूरत के बराबर भंडारण क्षमता विकसित करनी होगी. इतना ही नहीं, अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि बिना अनुमति भूजल का दोहन करने वाले संस्थानों पर भारी जुर्माना और कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

पार्कों में कंक्रीट का जाल होगा खत्म
अब पार्कों में चलने वाले रास्ते पूरी तरह कंक्रीट से नहीं ढके जाएंगे. नए नियम कहते हैं कि पार्कों में कंक्रीट का निर्माण 5% से अधिक नहीं होगा. वहां ऐसे ‘इंटरलॉकिंग ब्लॉक्स’ लगाए जाएंगे जिनसे पानी जमीन के भीतर रिस सके. इसका उद्देश्य जमीन को ‘कंक्रीट का कफन’ पहनाने से रोकना है ताकि बारिश का पानी सीधे पाताल में जा सके.

अतिक्रमण मुक्त होंगे तालाब और जलाशय
सिर्फ नए निर्माण ही नहीं, बल्कि गाजियाबाद के पुराने जल स्रोतों को बचाने के लिए भी मास्टर प्लान तैयार है. शहर की मास्टर प्लान और राजस्व अभिलेखों में दर्ज सभी तालाबों, पोखरों और वॉटर बॉडीज को संरक्षित किया जाएगा. इन जल निकायों से अवैध अतिक्रमण हटाकर उनकी GIS मैपिंग की जाएगी. शासन हर महीने की 15 तारीख को इसकी प्रगति की समीक्षा करेगा. इसके लिए ‘आवास बंधु’ के निदेशक को नोडल अधिकारी बनाया गया है.

10 एकड़ से बड़ी योजनाओं के लिए ‘तालाब’ अनिवार्य
बिल्डर्स और टाउनशिप विकसित करने वालों के लिए भी नए मानक तय किए गए हैं. अब किसी भी 10 एकड़ से बड़ी आवासीय योजना में कुल क्षेत्रफल का कम से कम 1 फीसदी हिस्सा तालाब (जलाशय) के लिए आरक्षित रखना होगा. जलाशय की गहराई 2 मीटर तय की गई है, ताकि वह सुरक्षित रहे और केवल वर्षा जल के लिए उपयोग हो सके.

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