US attacks Iran | USS Gerald R Ford Operation Epic Fury | USS Abraham Lincoln | ईरान से 1000 KM गुमसुम छिपा था काल, अचानक बरसाने लगा आग का गोला

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ईरान से 1000 KM छिपा था काल, अचानक बरसाने लगा आग का गोला, देखिए US का दैत्य

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मिडिल ईस्ट में तनाव अब एक भयंकर महायुद्ध में बदल चुका है. ईरान से 1000 किलोमीटर दूर भूमध्य सागर में अब तक शांत और रक्षात्मक मुद्रा में बैठा दुनिया का सबसे बड़ा अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर ‘यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड’ अचानक आक्रामक हो गया है. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के मदद करने के लिए अमेरिका ने भूमध्य सागर खड़े अपने यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड को एक्टिव कर दिया है. एयरक्राफ्ट कैरियर ‘यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड’ (USS Gerald R. Ford) दुनिया का सबसे बड़ा और खतरनाक कैरियर माना जाता है. अमेरिका ने इसे एक्टिव कर दिया है. ताजा जानकारी के के मुताबिक इस कैरियर से फाइटर जेट उड़ान भरने लगे हैं. अब ईरान ना केवल दक्षिण और पूर्व

दुनिया के सबसे अशांत क्षेत्र मिडिल ईस्ट में अब विनाश की कहानी लिखी जा रही है. अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले से यूएएस का सबसे खतरनाक और दुनिया का सबसे बड़ा एयर क्राफ्ट कैरियर हाइफा की खाड़ी में बेड़ा डाले हुए था. ये ईरान से लगभग 1000 किलोमीटर दूर पूर्वी भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) का क्षेत्र है. अमेरिका के इस दैत्य का नाम यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड’ (USS Gerald R. Ford) है. पहले तो ये डिफेंसिव मोड में इजरायल की रक्षा के लिए तैनात किया गया था. अब खामेनेई की मौत के अमेरिका ने इसे भी एक्टिव कर दिया है.

पूर्वी भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) गुमसुम छिपा मौत का काल अचानक जाग उठा है. दुनिया का सबसे बड़ा और खतरनाक एयरक्राफ्ट कैरियर ‘यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड’ (USS Gerald R. Ford) है. लेकिन अब इस ‘अमेरिकी दैत्य’ ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए ईरान की धरती पर आसमान से आग के गोले बरसाने शुरू कर दिए हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में खलबली मच गई है.

अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury) नाम दिया है. एक्स पर जारी एक पोस्ट के अनुसार, यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड सिर्फ एक युद्धपोत या एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं है, बल्कि यह अपने आप में अमेरिका का एक स्पष्ट और खौफनाक संदेश है. पूर्वी भूमध्य सागर से अमेरिका अब अपनी पूरी ताकत, सटीकता और संकल्प का प्रदर्शन कर रहा है. वाशिंगटन का सीधा संदेश है कि अगर अमेरिकी हितों को कोई भी देश खतरा पहुंचाएगा, तो अमेरिका अपनी पूरी सैन्य क्षमता के साथ उसके दरवाजे पर मौत बनकर खड़ा हो जाएगा.

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इस नए घटनाक्रम ने ईरान के लिए दोतरफा मुसीबत खड़ी कर दी है. इससे पहले तक अमेरिका केवल अरब सागर (Arabian Sea) और ओमान की खाड़ी से ही ईरान पर हमले कर रहा था. वहां तैनात एक अन्य घातक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन (USS Abraham Lincoln) लगातार अपने लड़ाकू विमानों से ईरान पर बमबारी कर रहा था. लेकिन अब भूमध्य सागर से यूएसएस फोर्ड के भी आक्रामक होने के बाद, ईरान पूरी तरह से अमेरिकी नौसेना के चक्रव्यूह में घिर गया है. यह पहली बार है जब दो अलग-अलग सागरों से एक साथ ईरान पर इतनी भारी सैन्य शक्ति का प्रयोग किया जा रहा है.

हालांकि, इस महाविनाशक हमले को अंजाम देना अमेरिका के लिए कोई आसान काम नहीं है. सबसे बड़ी चुनौती है भौगोलिक दूरी. पूर्वी भूमध्य सागर में तैनात यूएसएस फोर्ड और ओमान की खाड़ी में तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन, दोनों ही युद्धपोत ईरान की राजधानी तेहरान से 1,000 मील (लगभग 1600 किलोमीटर) से अधिक की दूरी पर हैं, हालांकि पूर्वी सीमा से काफी करीब यानी कि 1000 किलोमीटर दूर है.

अमेरिकी नौसेना के पास इस दूरी को पाटने के लिए वी-22 ऑस्प्रे (V-22 Osprey) टिल्टरोटर जैसे अत्याधुनिक विमान हैं. यह विमान हेलीकॉप्टर की तरह टेकऑफ करता है और हवाई जहाज की तरह तेज गति से उड़ता है. लेकिन विडंबना यह है कि यह असाधारण मशीन भी बिना कई बार हवा में ईंधन भरे (Mid-air Refueling) इतनी लंबी दूरी तय नहीं कर सकती. लेकिन ये फाइटर जेट ईरान के पूर्वी हिस्सों पर अटैक कर सकते हैं.

ईरान के हवाई खतरे और सीमा से दूरी को देखते हुए, अमेरिका के लिए किसी जमीनी अड्डे (Land Base) का उपयोग कर सकता है. सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि समंदर से सीधे हमले करने के बजाय अमेरिका जमीन पर मौजूद अपने पुराने ठिकानों का रुख कर सकता है. इनमें सबसे मुफीद जगह है उत्तरी इराक के कुर्दिश इलाके में स्थित ‘हरीर एयरबेस’ (Harir Airbase). यह वही सैन्य अड्डा है जहां से अमेरिकी स्पेशल-ऑप्स कमांडो ने कभी खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ बड़े और सफल अभियानों को अंजाम दिया था.

इराक का यह हरीर एयरबेस अमेरिका के लिए किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है. रिपोर्टों के अनुसार, आज भी वहां कुछ अमेरिकी सैन्य कर्मी और संसाधन मौजूद हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि यह एयरबेस ईरान की राजधानी तेहरान से 400 मील (लगभग 640 किलोमीटर) से भी कम दूरी पर स्थित है. भूमध्य सागर के 1000 मील के मुकाबले यह दूरी कुछ भी नहीं है. यहां से अमेरिकी लड़ाकू विमान और ऑस्प्रे बिना किसी मिड-एयर रिफ्यूलिंग के सीधे तेहरान पर बमबारी करके चंद मिनटों में सुरक्षित अपने बेस पर लौट सकते हैं.

इसके अलावा एक और विकल्प है, लेकिन बेहद खतरनाक हैं. ईरान के ही अंदर किसी अस्थायी सैन्य अड्डे (Temporary Base) पर कब्जा जमाना या उसे स्थापित करना. हालांकि, इतिहास गवाह है कि यह कदम अमेरिका के लिए पहले भी भारी पड़ चुका है. 1980 में ईरान में बंधक बनाए गए अमेरिकियों को छुड़ाने के लिए अमेरिका ने डेजर्ट वन (Desert One) नाम का ऑपरेशन चलाया था. यह ऑपरेशन बुरी तरह विफल रहा था और अमेरिकी विमान आपस में ही टकराकर क्रैश हो गए थे.

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