मालिक के साथ गाड़ी पर घूमती, खाना खाने में नखरे दिखाती.. पूरे परिवार की लाडली है लेडी डॉग ‘लूसी’

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Ballia Dog Lover: कहते हैं कि अगर बेजुबानों से लगाव रखा जाए, तो वह आपको इंसानों से भी ज्यादा मानने लगते हैं. बलिया के डॉग लवर और उनकी लेडी डॉग की यही कहानी है. इसको घर के बच्चों से भी ज्यादा प्यार-दुलार मिलता है. 

बलिया: बेहद प्यारी पालतू एक डॉग, जो एक महीने की नन्ही-सी उम्र में घर आई थी. यह धीरे-धीरे अब पूरे परिवार की धड़कन बन चुकी है. इस बेजुबान बच्ची का नाम लूसी रखा गया है. इसके मालिक के अनुसार, जब यह मासूम-सी थी, तभी से इसे बच्चे की तरह पाला गया है. आज तो घर में इसका दर्जा किसी सदस्य से कम नहीं है. इसको घर के बच्चों से भी ज्यादा प्यार-दुलार मिलता है.

डॉग लवर आवास विकास कॉलोनी बलिया निवासी सुरेश चंद्र ने कहा कि लूसी (female dog) पामेरियन नस्ल जहां भी जाती है, उनके साथ ही जाती है. कार की सवारी हो या मोटरसाइकिल की सैर, वह पूरे आत्मविश्वास के साथ दो पैरों पर खड़ी होकर या आराम से बैठकर ऐसे घूमती है, मानो कोई समझदार इंसान हो. राह चलते लोग इसे देखकर मुस्कुरा उठते हैं. उन्होंने आगे कहा कि यह पिछले जन्म में जरूर कोई अच्छे कर्म की होगी, तभी तो इंसानों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है और घर में सबसे ज्यादा प्यार पा रही है.

लूसी खाने में थोड़ी नखरीली

मजे की बात तो यह है कि लूसी खाने में थोड़ी नखरीली है. इसको बच्चों की तरह चम्मच से दूध पिलाया जाता है और खास तौर पर पेडिग्री खिलाई जाती है. बिल्कुल बच्चों की तरह उसकी देखभाल होती है. बाल झड़ने की समस्या आई, तो डॉक्टर की सलाह से इंजेक्शन लगवाया गया है. हर छह महीने में नियमित टीका भी लगाया जाता है, ताकि इसको कोई रोग न हो. अब तो यह बड़ी हो गई है, लेकिन अभी भी खूब बचपना करती है. जो लोग नशे की तरफ जा रहे हैं, अगर वह भी बेजुबानों से प्रेम करें, तो भविष्य संवर सकता है.

जानवर करते हैं इंसानियत की असली पहचान

हालांकि, सुरेश चंद्र पूर्व सभासद भी रह चुके हैं और डाकघर में भी सेवा दे चुके हैं. अब लोगों को संदेश दे रहे हैं कि बेजुबानों से प्रेम करना न केवल दया है, बल्कि इंसानियत की असली पहचान भी है. पशुओं से प्रेम करके इंसान अपने भविष्य को भी संवार सकता है. लूसी पर हर महीने लगभग 800 से 900 रुपए का अतिरिक्त खर्च आता है, लेकिन परिवार के लिए यह खर्च न के बराबर है. यह खुशियों में निवेश है. लूसी के बिना सुरेश नहीं रह पाते हैं और सुरेश के बगैर लूसी भी बेचैन सी हो जाती है.

About the Author

आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.

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