सुल्तानपुर का अनोखा हनुमान मंदिर, आस्था से जुड़ी है निर्माण की कहानी
Last Updated:
Sultanpur latest news : सुल्तानपुर के सिविल लाइन स्थित हनुमान मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है. यहां ब्राह्मण नहीं बल्कि लाला समाज के पुजारी पीढ़ियों से सेवा कर रहे हैं. वर्ष 1975 में स्थापित यह मंदिर आज हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां हर मंगलवार और शनिवार भीड़ उमड़ती है.
सुल्तानपुर : उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में स्थित हनुमान जी का एक अनोखा मंदिर अपनी परंपरा और आस्था के लिए प्रसिद्ध है. यहां पुजारी ब्राह्मण वर्ग से नहीं बल्कि लाला समाज से आते हैं. कई पीढ़ियों से एक ही परिवार मंदिर की सेवा करता आ रहा है. यह मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है.
सिविल लाइन में स्थित है यह मंदिर
सुल्तानपुर के सिविल लाइन मोहल्ले में स्थित यह हनुमान मंदिर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है. मंदिर में स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा दिव्य और भव्य मानी जाती है. विशेष बात यह है कि यहां पुजारी लाला समाज से हैं और पीढ़ियों से यही परिवार पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभा रहा है.
निर्माण की रोचक कहानी
मंदिर के पुजारी बाबा भगवान दास श्रीवास्तव बताते हैं कि मंदिर का निर्माण उनके पिता गोपाल दास लाला ने वर्ष 1975 में कराया था. इसके पीछे एक अनोखी आस्था जुड़ी है. परिवार की सुरक्षा और रक्षा के लिए गोपाल दास ने हनुमान जी से प्रार्थना की थी. मान्यता के अनुसार उन्हें संकेत मिला कि मंदिर का निर्माण कराया जाए. इसके बाद उन्होंने इस मंदिर की स्थापना कराई. तभी से यह स्थान आस्था का केंद्र बन गया.
मंगलवार और शनिवार को उमड़ती है भीड़
हर मंगलवार और शनिवार को मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है. भक्त हनुमान जी के दर्शन कर प्रसाद चढ़ाते हैं और अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं. चैत्र माह में रामनवमी के अवसर पर यहां विशेष कार्यक्रम आयोजित होता है. इस दिन भव्य भंडारे का आयोजन किया जाता है. रामचरितमानस का पाठ भी होता है. हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं.
मन्नतों के लिए प्रसिद्ध है मंदिर
स्थानीय मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से यहां दर्शन करता है उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. मंदिर परिसर में हनुमान जी के साथ भगवान राम और माता सीता की मूर्तियां भी स्थापित हैं. इसके अलावा भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग भी मौजूद है. मंदिर के मुख्य द्वार के सामने एक 50 वर्ष से अधिक पुराना पीपल का पेड़ है. श्रद्धालु वहां भी जल अर्पित करते हैं और पूजा करते हैं.
दूर-दराज से पहुंचते हैं श्रद्धालु
सिर्फ शहर ही नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग यहां आते हैं. कादीपुर, कूरेभार, कुड़वार, अखंड नगर और जयसिंहपुर समेत आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु नियमित रूप से दर्शन करने पहुंचते हैं. यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि सामाजिक सद्भाव और परंपरा की अनूठी मिसाल भी पेश करता है. लाला समाज द्वारा पीढ़ियों से निभाई जा रही सेवा इस मंदिर को विशेष पहचान देती है.