DDUGU में जीवामृत पर रिसर्च, कम लागत में ज्यादा उत्पादन का दावा, प्राकृतिक खेती की ओर कदम

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गोरखपुर: DDUG दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में इन दिनों जीवामृत खाद को लेकर विशेष रिसर्च किया जा रहा है. विभाग के प्रोफेसरों का कहना है कि खेती में नई तकनीक या नई खाद को अपनाने में जमीन को समय लगता है. मिट्टी की अपनी जैविक संरचना होती है, जो धीरे-धीरे बदलाव को स्वीकार करती है. इसी को ध्यान में रखते हुए गोबर, बेसन और गुड़ से तैयार जीवामृत के प्रभाव पर अध्ययन किया जा रहा है, ताकि कम लागत में अधिक उत्पादन का मॉडल तैयार किया जा सके.

क्या है जीवामृत और कैसे बनता है?

जीवामृत एक प्राकृतिक तरल खाद है, जिसे देसी गोबर, गुड़, बेसन और पानी को मिलाकर तैयार किया जाता है. गोबर में लाभकारी सूक्ष्मजीव होते हैं. गुड़ इन जीवाणुओं के लिए ऊर्जा का काम करता है और बेसन नाइट्रोजन व प्रोटीन का स्रोत बनता है. इन तीनों को मिलाने से सूक्ष्मजीव तेजी से सक्रिय होते हैं और एक जैविक घोल तैयार होता है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होता है. शोध के दौरान इस घोल को नियंत्रित मात्रा में खेतों में प्रयोग कर उसके असर का परीक्षण किया जा रहा है.

मिट्टी और फसल पर क्या होगा असर

प्रोफेसर अनुपम दुबे के अनुसार, जहां पहले केवल यूरिया या रासायनिक खाद का उपयोग होता था, वहां यदि गोबर आधारित जीवामृत का इस्तेमाल किया जाए, तो मिट्टी की जैविक क्षमता बेहतर होती है. यह खाद मिट्टी में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और फफूंद की संख्या बढ़ाती है, जिससे पौधों की जड़ों को पोषण आसानी से मिलता है. लंबे समय में इससे मिट्टी की संरचना सुधरती है और पानी धारण करने की क्षमता भी बढ़ती है.

कम लागत में ज्यादा मुनाफा

शोध से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि गोबर, गुड़ और बेसन गांवों में आसानी से उपलब्ध सामग्री है. ऐसे में किसान कम खर्च में खुद जीवामृत तैयार कर सकते हैं. रासायनिक खाद पर निर्भरता घटने से लागत कम होगी और उत्पादन में स्थिरता आएगी. यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो गोरखपुर और आसपास के जिलों के किसानों के लिए यह मॉडल बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है.

भविष्य की खेती की ओर कदम

एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट का लक्ष्य है कि वैज्ञानिक तरीके से प्रमाणित परिणाम सामने आएं, ताकि किसानों को भरोसे के साथ इस तकनीक को अपनाने की सलाह दी जा सके. आने वाले समय में प्रशिक्षण शिविरों और कार्यशालाओं के माध्यम से किसानों को जीवामृत के उपयोग की जानकारी दी जाएगी. यह पहल प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है.

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