300 रुपए लेकर घर से निकले, फुटपाथ पर सोए, संघर्ष की धूप में तपकर लिख डाली हिट फिल्मों की कहानी

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ब्रश और रंगों के साथ जिंदगी बिताने का सपना लेकर घर से निकले एक युवक को शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि किस्मत उसे कैमरे के पीछे खड़ा कर देगी. आज वही नाम भारतीय सिनेमा में सामाजिक और राजनीतिक फिल्मों के लिए जाना जाता है. प्रकाश झा की कहानी इस बात की मिसाल है कि रास्ते भले बदल जाएं, लेकिन जुनून आपको आखिरकार आपकी असली पहचान तक पहुंचा ही देता है.

300 रुपए लेकर घर से निकले, फुटपाथ पर सोए, संघर्ष की धूप में तपकर चमकी किस्मत Zoom

कई हिट फिल्मों से जीता फैंस का दिल

नई दिल्ली. आज प्रकाश झा को लोग एक ऐसे फिल्ममेकर के तौर पर जानते हैं जो समाज और राजनीति पर बेबाक फिल्में बनाते हैं. उनकी फिल्मों में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सच्चाई की झलक भी मिलती है. लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि उनका पहला सपना फिल्में बनाना नहीं, बल्कि पेंटिंग करना था. वे ब्रश और रंगों की दुनिया में अपना करियर बनाना चाहते थे.

27 फरवरी 1952 को बिहार के पश्चिम चंपारण में जन्मे प्रकाश झा का बचपन गांव में बीता. पढ़ाई में तेज थे, इसलिए आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी पहुंचे और बीएससी में दाखिला लिया. लेकिन दिल तो कला में लगता था. पेंटर बनने का सपना इतना मजबूत था कि उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और मुंबई का रुख कर लिया.

पेंटर बनने वाले थे, बन बैठे फिल्ममेकर

मुंबई पहुंचकर उन्होंने पेंटिंग सीखनी शुरू किया. इसी दौरान उन्हें फिल्म ‘धर्मा’ की शूटिंग देखने का मौका मिला. कैमरे की हलचल, सेट का माहौल और कलाकारों का काम देखकर वे काफी प्रभावित हुए. बस वहीं से जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया. उन्होंने तय कर लिया कि अब फिल्मों की दुनिया में ही आगे बढ़ना है. इसके बाद वे पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया पहुंचे. पढ़ाई भले पूरी नहीं हो पाई, लेकिन जो सीखा वही उनके काम आया.

आसान नहीं था ये सफर

संघर्ष का दौर आसान नहीं था. वे घर से सिर्फ 300 रुपए लेकर निकले थे. पैसों की तंगी में कई बार भूखे रहे, फुटपाथ पर भी सोए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. धीरे-धीरे उन्होंने डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनानी शुरू कीं. उनकी डॉक्यूमेंट्री ‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और यहीं से उन्हें पहचान मिलने लगी.

बता दें साल 1984 में ‘हिप हिप हुर्रे’ से उन्होंने निर्देशन की शुरुआत की. फिर ‘दामुल’ ने उन्हें अलग पहचान दिलाई. इसके बाद ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’ और ‘सत्याग्रह’ जैसी फिल्मों से उन्होंने समाज और सिस्टम पर करारा प्रहार किया. निजी जिंदगी में उन्होंने 1985 में अभिनेत्री दीप्ति नवल से शादी की. दोनों ने दिशा नाम की बेटी को गोद लिया. करीब 17 साल बाद दोनों अलग हो गए.प्रकाश झा की कहानी बताती है कि सपने भले बदल जाएं, लेकिन जुनून अगर सच्चा हो तो मंजिल मिल ही जाती है.

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Munish Kumar

न्यूज 18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार का डिजिटल मीडिया में 9 सालों का अनुभव है. एंटरटेनमेंट रिपोर्टिंग, लेखन, फिल्म रिव्यू और इंटरव्यू में विशेषज्ञता है. मुनीष ने जामिया मिल्लिया इ…और पढ़ें

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