Garuda Purana Night Cremation Hindu Ritual। गरुड़ पुरान के अनुसार रात में दाह संस्कार क्यों नहीं होता

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Garuda Purana Night Cremation: मौत यह शब्द सुनते ही भीतर कहीं एक सन्नाटा उतर आता है. हम सब जानते हैं कि जन्म लिया है तो एक दिन जाना भी है, फिर भी जब घर के आंगन में किसी अपने का निर्जीव शरीर रखा होता है, तो समय जैसे थम जाता है. रोते-बिलखते लोग, धीमी आवाज़ में मंत्रोच्चार और बीच में सफेद कपड़े में लिपटा शव. अगर मृत्यु सूर्यास्त के बाद हुई हो, तो अंतिम संस्कार अगली सुबह तक टाल दिया जाता है. यही वह लंबी, भारी रात होती है जब परिवार का कोई सदस्य शव के पास बैठा रहता है. सवाल उठता है आख़िर क्यों? क्या यह सिर्फ परंपरा है या इसके पीछे कोई गहरी धार्मिक मान्यता छिपी है? इस रहस्य की चर्चा प्राचीन ग्रंथ गरुड़ पुराण में विस्तार से मिलती है.

सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार क्यों नहीं?
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार वर्जित माना गया है. गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि रात का समय तमोगुणी शक्तियों का माना जाता है. ऐसी धारणा है कि अंधेरा बढ़ने के साथ नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय हो जाती है, जिससे आत्मा की आगे की यात्रा में बाधा आ सकती है. ग्रामीण इलाकों में आज भी यह परंपरा सख्ती से निभाई जाती है. बुज़ुर्ग बताते हैं कि “सुबह की पहली किरण” शुभ मानी जाती है उसी समय अंतिम संस्कार करना आत्मा की शांति के लिए उचित समझा जाता है. यह मान्यता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन का हिस्सा भी है.

पंचक और अन्य ज्योतिषीय कारण
ज्योतिष शास्त्र में पंचक काल को अशुभ माना गया है. अगर इस दौरान मृत्यु हो जाए, तो विशेष शांति अनुष्ठान किए जाते हैं. कई परिवारों में बिना पूजा के अंतिम संस्कार नहीं किया जाता. मान्यता है कि नियमों की अनदेखी परिवार के लिए कठिनाइयां ला सकती है. हालांकि शहरी जीवन में इन परंपराओं का पालन थोड़ा लचीला हुआ है, फिर भी अनेक परिवार आज भी पंडित की सलाह लेकर ही आगे की प्रक्रिया तय करते हैं.

व्यावहारिक कारण भी कम नहीं
सिर्फ आध्यात्मिक ही नहीं, कुछ बेहद व्यावहारिक कारण भी हैं. मृत्यु के कुछ घंटों बाद शरीर में परिवर्तन शुरू हो जाते हैं. ऐसे में शव को अकेला छोड़ना सुरक्षित नहीं माना जाता. गांवों में खुले आंगन या कच्चे घरों में जानवरों का खतरा वास्तविक रहा है. इसलिए रात भर किसी का पास बैठना एक तरह से सुरक्षा का उपाय भी था. साथ ही, धूप-अगरबत्ती जलाकर वातावरण को स्वच्छ रखने की कोशिश की जाती है. यह परंपरा धीरे-धीरे धार्मिक रूप ले चुकी है.

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आत्मा और मोह की धारणा
धार्मिक मान्यता कहती है कि मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा अपने घर-परिवार के आसपास ही रहती है. उसे अपने शरीर और प्रियजनों से मोह होता है. ऐसे में शव को अकेला छोड़ देना आत्मा के लिए पीड़ादायक माना जाता है. कई लोगों के निजी अनुभव भी इस विश्वास को मज़बूत करते हैं. किसी ने बताया कि पूरी रात परिवार के लोग भजन गाते रहे, ताकि माहौल सकारात्मक बना रहे. यह पहरा डर से ज्यादा प्रेम और सम्मान का प्रतीक बन जाता है.

बदलता समय, बदलती सोच
आज के आधुनिक अस्पतालों और विद्युत शवदाह गृहों के दौर में कई प्रक्रियाएं बदल गई हैं. शहरों में 24 घंटे अंतिम संस्कार की सुविधा उपलब्ध है. फिर भी, परंपरा और आस्था का प्रभाव कम नहीं हुआ है. युवा पीढ़ी सवाल पूछती है, तर्क खोजती है. लेकिन जब घर में ऐसी स्थिति आती है, तो वही लोग परंपरा का पालन करते दिखते हैं. शायद इसलिए कि यह सिर्फ नियम नहीं, बल्कि विदाई का एक भावनात्मक तरीका भी है.

अंततः, शव को रात में अकेला न छोड़ने की परंपरा कई स्तरों पर समझी जा सकती है धार्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक. इसे अंधविश्वास कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन इसके पीछे पीढ़ियों का अनुभव और भावनात्मक संवेदना जुड़ी है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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