बेटी ने सुनाई ‘पापा’ की कहानी, रोक नहीं पाएंगे आंसू, क्यों यूपी के लिए अभिशाप बन गया नीला ड्रम?

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लखनऊ. यूपी में इन दिनों अपराध के तरीकों ने पुलिस और समाज दोनों को हैरत में डाल दिया है. लखनऊ से आई एक तस्वीर ने हर उस मां-बाप को डरा दिया है, जो अपने बेटे को बुढ़ापे का सहारा मानते हैं. लखनऊ की बेटी ने अपने पिता की जो कहानी सुनाई है, वह आपको हिलाकर रख देगी. कैसे एक बेटे ने बाप को मारकर उसके साथ कैसा सलूक किया. पहले मेरठ और अब लखनऊ से आई दो अलग-अलग घटनाओं ने एक अजीब और खौफनाक समानता दिखाई है. वह समानता है ‘नीला ड्रम’ का. जिस नीले ड्रम का इस्तेमाल घरों में पानी भरने या अनाज रखने के लिए होता है, वह अब लाशों को ठिकाने लगाने का जगह बनता जा रहा है. अपराध को अंजाम देने के बाद यह नई ‘मोडस ऑपरेंडी’ उत्तर प्रदेश के लिए क्या एक अभिशाप की तरह उभर रही है?

मेरठ वाली नीले ड्रम की कहानी

नीले ड्रम का खौफनाक सफर मेरठ से चर्चा में आया था. यहां एक पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही पति की बेरहमी से हत्या कर दी. कहानी की शुरुआत होती है 2025 में यूपी के मेरठ शहर से. सौरभ राजपूत, 35 साल का पूर्व मर्चेंट नेवी अधिकारी, लंदन से अपनी पत्नी मुस्कान रस्तोगी को जन्मदिन पर सरप्राइज देने लौटा था. लेकिन घर पहुंचते ही उसका सामना विश्वासघात से हुआ. पत्नी मुस्कान, जो अपने प्रेमी साहिल शुक्ला से रिश्ते में थी, ने सौरभ को सेडेटिव्स देकर बेहोश किया. फिर साहिल के साथ मिलकर उसे चाकू से गोदा, गला काटा और बॉडी को चार टुकड़ों में काटा. इन टुकड़ों को 220 लीटर के नीले प्लास्टिक ड्रम में रखकर सीमेंट से सील कर दिया. ड्रम घर में ही दो हफ्ते तक रखा रहा, जबकि दोनों आरोपी हिमाचल प्रदेश भाग गए. मनाली में बर्फबारी का मजा लेते, कसोल में पार्टी करते रहे. बाद में मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार किया गया और यह केस नीला ड्रम मर्डर के नाम से मशहूर हो गया.

अब लखनऊ में फिर सामने आया नीला ड्रम

समय बीता, लेकिन नीले ड्रम का साया नहीं हटा. अब 2026 में राजधानी लखनऊ में एक और दिल दहला देने वाली घटना घटी. 49 साल के मणवेंद्र प्रताप सिंह जो एक बिजनेसमैन थे. जिनका लखनऊ में पैथोलॉजी लैब और शराब के कारोबार थे, उनके 19-21 साल के बेटे अक्षत प्रताप सिंह ने गोली मार दी. मणवेंद्र अपनी पत्नी की मौत के बाद अकेले बच्चों को पाल रहे थे, लेकिन बेटे पर डॉक्टर बनने का प्रेशर डालते थे. जबकि अक्षत परिवार का बिजनेस संभालना चाहता था. 20 फरवरी की सुबह 4:30 बजे झगड़े के दौरान अक्षत ने लाइसेंसी राइफल से पिता को गोली मारी. फिर बॉडी को टुकड़ों में काटा. पैर घुटनों से नीचे, हाथ काटे, सिर अलग. टॉर्सो को स्लीपिंग बैग में लपेटकर नीले ड्रम में छुपा दिया, जबकि बाकी हिस्सों को शहर के बाहर सदरौना इलाके में फेंक दिया. सिर अभी भी गायब है और अक्षत ने 10 लीटर केरोसीन खरीदा था ताकि बॉडी जला सके. अगले दिन उसने पिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई, रिश्तेदारों से सामान्य व्यवहार किया. लेकिन पुलिस की जांच में सच्चाई सामने आई. अक्षत को गिरफ्तार किया गया और उसने कबूल किया कि पिता का दबाव सहन नहीं हो रहा था.

दो घटनाएं एक डरावने पैटर्न

मेरठ और लखनऊ की ये दो घटनाएं एक डरावने पैटर्न को दिखाती हैं. मेरठ में पत्नी का विश्वासघात, प्रेमी के साथ मिलकर हत्या. एक रोमांटिक एंगल. लखनऊ में बेटे का विद्रोह, पिता के दबाव से हत्या. एक पारिवारिक एंगल. लेकिन दोनों में नीला ड्रम कोमन. मेरठ के केस ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं और अब लखनऊ का केस उसी की याद दिलाता है.

क्या कहते हैं जानकार?

विशेषज्ञ कहते हैं कि मीडिया कवरेज से अपराधी प्रेरित होते हैं और नीला ड्रम, जो वाटरप्रूफ, बड़ा और अनदेखा रहने वाला होता है, एक आसान चॉइस बन जाता है. राजस्थान, पंजाब जैसे अन्य राज्यों में भी इसी तरह के ब्लू ड्रम केस सामने आए हैं, जैसे किशनगढ़ में एक पत्नी ने प्रेमी के साथ पति को मारकर ड्रम में रखा.

क्यों अपराधियों की पहली पसंद बना ‘नीला ड्रम’?

  1. आसानी से उपलब्धता: ये ड्रम हर कबाड़ी या हार्डवेयर की दुकान पर आसानी से और सस्ते मिल जाते हैं.
  2. दुर्गंध रोकना: प्लास्टिक का होने और एयरटाइट ढक्कन होने के कारण, लाश की बदबू बाहर आने में समय लगता है, जिससे अपराधी को भागने का वक्त मिल जाता है.
  3. आसान परिवहन: ड्रम को सामान की तरह किसी भी रिक्शे या गाड़ी में लादकर ले जाना लाश को चादर या बोरे में ले जाने से ज्यादा सुरक्षित लगता है.

मेरठ से लखनऊ तक फैली यह ‘नीले ड्रम की कहानी’ केवल दो हत्याओं की बात नहीं है, बल्कि यह अपराधियों की उस क्रूर मानसिकता को दर्शाती है जहां रिश्तों का खून कर उसे कूड़े की तरह प्लास्टिक के डब्बे में बंद कर दिया जाता है. उत्तर प्रदेश पुलिस अब ऐसे मामलों में कबाड़ विक्रेताओं और ड्रम बेचने वालों पर भी नजर रख रही है. समाज में यह नीला ड्रम अब पानी का नहीं, बल्कि खौफ का प्रतीक बनता जा रहा है.

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