NEET-PG Cut Off| NEET-PG cut-off row: कम अंक पर डॉक्टर की योग्यता पर सवाल, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया ये जवाब

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SC Hearing, NEET PG cut off row: नीट पीजी 2025-26 के कट ऑफ में कटौती के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज सुनवाई की जिसमें सरकार की ओर से कहा गया कि नीट पीजी का कट ऑफ कम होने से डॉक्‍टरों की योग्‍यता पर कोई असर नहीं पडेगा.

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NEET PG 2025-26, NEET PG Cut Off Reduction, NEET PG cut-off row: नीट पीजी कट ऑफ पर क्‍या हुई सुनवाई?

NEET PG 2026: नीट पीजी 2025-26 के कट-ऑफ में भारी कटौती के बाद देशभर में बहस छिड़ गई है. मेडिकल छात्र, अभिभावक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं कि क्या इससे पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी. कई लोगों का मानना है कि कम अंक पर स्पेशलाइजेशन में दाखिला मिलने से भविष्य में अच्छे विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी हो सकती है. इसी बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए साफ किया है कि नीट पीजी का मकसद किसी छात्र की न्यूनतम डॉक्टर बनने की योग्यता तय करना नहीं है. आइए जानते हैं कि पूरा मामला है क्‍या?

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने अपना हलफनामा दाखिल किया.सरकार का कहना है कि नीट पीजी न्यूनतम चिकित्सकीय योग्यता प्रमाणित करने की परीक्षा नहीं है. डॉक्टर बनने की असली पात्रता MBBS की पढ़ाई और इंटर्नशिप पूरी करने से साबित हो जाती है.नीट पीजी सिर्फ सीमित पोस्टग्रेजुएट (MD/MS) सीटों के लिए उम्मीदवारों की मेरिट लिस्ट तैयार करने की परीक्षा है.सरकार ने ये भी कहा कि नीट पीजी देने वाला हर उम्मीदवार पहले से ही एक योग्य डॉक्टर होता है. वो 4.5 साल की MBBS पढ़ाई पूरी कर चुका होता है. इसके बाद एक साल की अनिवार्य इंटर्नशिप भी कर चुका होता है. MBBS पास करने के लिए थ्योरी और प्रैक्टिकल में कम से कम 50% अंक लाना जरूरी होता है. इसलिए नीट पीजी में कम अंक आने का मतलब ये नहीं कि डॉक्टर कमजोर है.

सुप्रीम कोर्ट की चिंता क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो इस बात की जांच करेगा कि कट-ऑफ में इतनी बड़ी कमी से पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ता है या नहीं.जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने याचिकाओं पर सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि भले ही नीट पीजी MBBS जैसी न्यूनतम योग्यता परीक्षा नहीं है, लेकिन कट-ऑफ को लगभग शून्य तक घटाने के प्रभाव पर विचार जरूरी है.अदालत का मुख्य सरोकार शिक्षा की गुणवत्ता है. सरकार को ये संतुष्ट करना होगा कि इससे गुणवत्ता प्रभावित नहीं होगी.

याचिकाकर्ताओं का क्या कहना है?

याचिकाकर्ताओं ने फीस असमानता का मुद्दा उठाया. उन्होंने बताया कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फीस ₹9,000 से ₹27,000 तक होती है.निजी कॉलेजों में फीस ₹95 लाख से ₹1.5 करोड़ तक पहुंच जाती है. 50वें पर्सेंटाइल तक करीब 1.3 लाख छात्र उपलब्ध होने के बावजूद अत्यधिक फीस की वजह से निजी कॉलेजों में दाखिला नहीं ले पाते. उन्होंने निजी कॉलेजों की फीस पर सीमा तय करने की मांग की.सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आंशिक रूप से सुना हुआ माना है. अब इस मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च 2026 को होगी.इससे पहले सरकार और NBEMS को और स्पष्टीकरण देने होंगे. ये विवाद 13 जनवरी 2026 को NBEMS द्वारा जारी नोटिस से शुरू हुआ, जिसमें तीसरे काउंसलिंग राउंड के लिए कट-ऑफ में इतनी बड़ी कटौती की गई थी.

कट-ऑफ में इतनी बड़ी कमी क्यों की गई?

इस बार नीट पीजी का कट-ऑफ काफी कम रखा गया है.जनरल और EWS वर्ग के लिए कट-ऑफ 103 अंक (7वां पर्सेंटाइल) तय किया गया.जनरल PwBD के लिए 90 अंक,SC/ST/OBC और PwBD वर्ग के लिए कट-ऑफ -40 अंक (0वां पर्सेंटाइल) कर दिया गया.इसका मुख्य कारण ये बताया गया कि हर साल बड़ी संख्या में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें खाली रह जाती हैं.लगभग 70,000 सीटें उपलब्ध होने के बावजूद सभी सीटों पर दाखिला नहीं हो पाता. दो लाख से ज्यादा छात्र परीक्षा देते हैं, लेकिन कट-ऑफ ज्यादा होने से कई योग्य छात्र बाहर रह जाते हैं.सरकार का मानना है कि मेडिकल सीटें सार्वजनिक संसाधनों से तैयार होती हैं, इसलिए इन्हें खाली छोड़ना नुकसानदायक है. कट-ऑफ घटाकर ज्यादा छात्रों को काउंसलिंग में शामिल होने का मौका दिया गया ताकि सीटें भरी जाएं और देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाई जा सके.

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Dhiraj Raiअसिस्टेंट एडिटर

न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर कार्यरत. न्‍यूज 18 में एजुकेशन, करियर, सक्‍सेस स्‍टोरी की खबरों पर. करीब 15 साल से अधिक मीडिया में सक्रिय. हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर के प्रिंट व …और पढ़ें

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