तेलंगाना की विलुप्त होती चेरियाल पेंटिंग | Cheriyal Scroll Painting Heritage of Telangana

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तेलंगाना की अनोखी विरासत: विलुप्त होती चेरियाल स्क्रॉल पेंटिंग; कपड़ों पर

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Cheriyal Scroll Painting Heritage of Telangana: तेलंगाना की चेरियाल स्क्रॉल पेंटिंग भारत का प्राचीन सिनेमा कहलाती है. खादी के लंबे कपड़ों पर प्राकृतिक रंगों से बनाई जाने वाली ये पेंटिंग्स रामायण और महाभारत की कहानियों को संगीत के साथ पेश करती हैं. आज यह कला लुप्त होने की कगार पर है.

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हैदराबाद. आधुनिक दौर में जहाँ दुनिया 70mm की स्क्रीन और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर फिल्में देखने की आदी हो चुकी है, वहीं तेलंगाना के एक छोटे से गाँव में आज भी ‘आदिम सिनेमा’ की एक अद्भुत झलक जीवित है. तेलंगाना के सिद्दीपेट जिले के चेरय्याला गाँव की पहचान यहाँ की जादुई ‘चेरियाल स्क्रॉल पेंटिंग’ से है. यहाँ के कलाकार कागज़ और कपड़े के लंबे स्क्रॉल्स पर ऐसी दुनिया रचते हैं, जो सदियों से भारतीय लोक कथाओं और महाकाव्यों को जीवंत करती आ रही है. यह कला केवल चित्रकारी नहीं, बल्कि प्राचीन भारत में मनोरंजन और शिक्षा का एक सशक्त माध्यम रही है.

चेरियाल स्क्रॉल पेंटिंग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबाई और इसके पीछे की कहानी कहने की कला है. स्थानीय भाषा में इसे ‘नकाशी कला’ कहा जाता है. कलाकार हाथ से बने खादी के कपड़ों पर 40 से लेकर 60 फीट तक लंबे स्क्रॉल्स तैयार करते हैं. पुराने ज़माने में जब मनोरंजन के साधन अत्यंत सीमित थे, तब काकीपडागोलु समुदाय के कहानीकार इन विशाल स्क्रॉल्स को लकड़ी के बक्सों में रखकर गाँव-गाँव ले जाते थे. यह उस दौर का चलता-फिरता थिएटर हुआ करता था, जो लोगों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता था.

संगीत और चित्रों का अनोखा संगम
गाँव के चौराहे पर जब ये कलाकार जुटते थे, तो वे इन लंबे स्क्रॉल्स को धीरे-धीरे खोलना शुरू करते थे. जैसे-जैसे चित्र सामने आते, कलाकार संगीत और गायन के साथ रामायण, महाभारत और स्थानीय लोक कथाओं का सजीव वर्णन करते थे. यह बिल्कुल आज के ‘स्लाइड शो’ या फिल्म की तरह होता था, जहाँ दर्शक चित्रों को देखकर कहानी को गहराई से महसूस करते थे. इन चित्रों की शैली और प्रस्तुतीकरण इतना प्रभावी होता था कि इसे भारत का सबसे प्राचीन या आदिम सिनेमा माना जाता है.

जटिल प्रक्रिया और प्राकृतिक रंगों का जादू
इन पेंटिंग्स को तैयार करने की विधि आज भी उतनी ही पारंपरिक और जटिल है. खादी के कपड़े पर चावल के मांड, सफेद मिट्टी और इमली के बीजों के गोंद का लेप लगाकर उसे तैयार किया जाता है. इसमें किसी भी कृत्रिम रंग का प्रयोग नहीं होता. कलाकार पत्थरों को पीसकर पीला रंग, पौधों से हरा और काजल से काला रंग तैयार करते हैं. चटख लाल रंग का बैकग्राउंड इस कला की सबसे बड़ी पहचान है. हालांकि, आज डिजिटल युग में इस कला के सामने अस्तित्व का संकट है. 60 फीट लंबे स्क्रॉल बनाने में महीनों की मेहनत लगती है, लेकिन बाजार कम होने के कारण अब कलाकार छोटे फ्रेम और मुखौटे बनाकर इस विरासत को बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

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vicky Rathore

Vicky Rathore is a multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience in digital media, social media management, video production, editing, content writing, and graphic, A MAJMC gra…और पढ़ें

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