आखिर क्यों मालू के पत्ते में ही पैक की जाती है सिंगौड़ी, क्या है इसके पीछे की वजह, इतने दिन तक नहीं होती खराब – Uttarakhand News

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बागेश्वर की प्रसिद्ध मिठाई सिंगौड़ी अपने स्वाद के साथ मालू के पत्ते में पारंपरिक पैकिंग के लिए जानी जाती है. मालू के पत्तों में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो मिठाई को गर्मियों में लगभग 24 और सर्दियों में 48 घंटे तक सुरक्षित रखते हैं. यह पत्ता नमी संतुलित रखता है और खास सुगंध भी देता है. कुमाऊं क्षेत्र में यह परंपरा आज भी कायम है, जो पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक मानी जाती है.

मालू के पत्तों में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं, जो मिठाई को खराब होने से बचाते हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में पुराने समय में फ्रिज की सुविधा नहीं थी, तब भी सिंगौड़ी लंबे समय तक सुरक्षित रहती थी. आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि पत्तों में मौजूद जैविक तत्व बैक्टीरिया की वृद्धि को धीमा करते हैं. यही कारण है कि पत्ते में गर्मियों में लगभग 24 और सर्दियों में 48 घंटे तक सिंगौड़ी सुरक्षित रहती है.

स्थानीय व्यापारी नरेंद्र राणा बताते हैं कि मालू के पत्तों में हल्की प्राकृतिक सुगंध होती है. जब सिंगौड़ी को इन पत्तों में लपेटा जाता है, तो उसमें एक खास तरह की खुशबू समा जाती है. यह सुगंध मिठाई के स्वाद को और भी खास बना देती है. असली सिंगौड़ी का स्वाद तभी पूरा होता है, जब वह मालू के पत्ते में लिपटी जाती है. यही वजह है कि आज भी कुमाऊं के बाजार इस पारंपरिक तरीके को प्राथमिकता दी जाती है.

मालू का पत्ता मोटा और लचीला होता है, जो अंदर की नमी को संतुलित बनाए रखता है. सिंगौड़ी मुख्य रूप से खोया और चीनी से बनती है, जिसे ताजा रखना जरूरी होता है. पत्ता अतिरिक्त नमी को सोख लेता है, मिठाई को चिपचिपा नहीं होने देता है. इससे सिंगौड़ी लंबे समय तक अपनी बनावट और स्वाद बरकरार रखती है. यह प्राकृतिक पैकिंग मिठाई को सूखने भी नहीं देती है.

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आज जब प्लास्टिक प्रदूषण बड़ी समस्या बन चुका है, तब मालू के पत्ते पर्यावरण-अनुकूल विकल्प साबित होते हैं. यह पूरी तरह जैविक और नष्ट होने योग्य होते हैं. पहाड़ों में सदियों से पत्तल और दोने बनाने में इनका यूज किया जाता है. सिंगौड़ी की पैकिंग में भी इनका इस्तेमाल पर्यावरण संरक्षण की परंपरा को आगे बढ़ाता है. यह स्थानीय संसाधनों के उपयोग का बेहतरीन उदाहरण है.

उत्तराखंड के मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में मालू के पत्तों को शुभ माना जाता है. शादी-ब्याह और पूजा-पाठ में इनका विशेष महत्व है. सिंगौड़ी अक्सर प्रसाद या उपहार के रूप में दी जाती है, इसलिए इसे शुभ पत्ते में लपेटना परंपरा का हिस्सा बन गया है. यह केवल मिठाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान भी है.

सिंगौड़ी का इतिहास कुमाऊं क्षेत्र से जुड़ा है, और इसे खास पहचान मिली अल्मोड़ा और बागेश्वर से. पुराने समय में स्थानीय कारीगर जंगल से मालू के पत्ते लाकर मिठाई तैयार करते थे. पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा चली आ रही है. आज आधुनिक पैकिंग उपलब्ध होने के बावजूद लोग उसी पारंपरिक तरीके को अपनाना पसंद करते हैं.

मालू का पत्ता आकार में बड़ा, मजबूत और आसानी से मोड़ा जा सकता है. इससे सिंगौड़ी को शंकु आकार में लपेटना आसान होता है. यह टूटता नहीं और मिठाई को अच्छी तरह सुरक्षित रखता है. इसकी मजबूती के कारण परिवहन के दौरान भी सिंगौड़ी सुरक्षित रहती है. यही कारण है कि दुकानदार इसे सबसे भरोसेमंद पैकिंग मानते हैं.

मालू के पत्तों की मांग से ग्रामीणों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है. पहाड़ी महिलाएं और ग्रामीण इन्हें इकट्ठा कर बाजार में बेचते हैं. इससे स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिलता है. सिंगौड़ी की लोकप्रियता जितनी बढ़ती है, उतना ही मालू के पत्तों की मांग भी बढ़ती है. इस तरह यह परंपरा स्वाद के साथ-साथ आजीविका का साधन भी बन गई है.

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