जब हीरोइन पर लगा ‘बदसूरत’ का ठप्पा, ठुकरा दी ‘मुगल-ए-आजम’, टैलेंट के दम पर बनीं लीजेंड
Last Updated:
मशहूर अभिनेत्री नूतन को शुरुआती दिनों में अपने रंग-रूप के कारण ‘बदसूरत’ होने के ताने सुनने पड़े थे, जिससे उनका आत्मविश्वास डगमगा गया था. यहां तक कि उन्होंने कम आत्मविश्वास के कारण ‘मुगल-ए-आजम’ में अनारकली का रोल भी ठुकरा दिया था. उनकी मां शोभना समर्थ ने उन्हें हौसला दिया और पढ़ाई के लिए विदेश भेजा, जहां से वे एक नई शख्सियत और आत्मविश्वास के साथ लौटीं. 1955 में फिल्म ‘सीमा’ से शानदार वापसी कर उन्होंने चार दशकों तक बॉलीवुड पर राज किया और साबित किया कि असली खूबसूरती इंसान के टैलेंट में होती है.

एक्ट्रेस ने कई यादगार रोल निभाए.
नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन अभिनेत्रियों में शुमार नूतन की सादगी और खूबसूरती के किस्से आज भी मशहूर हैं, लेकिन हकीकत यह है कि एक समय उन्हें खुद के लुक्स पर बिल्कुल भरोसा नहीं था. आज उनकी पुण्यतिथि पर यह जानना बेहद दिलचस्प है कि जिस चेहरे पर दुनिया फिदा थी, उसे कभी ‘बदसूरत’ होने का ताना झेलना पड़ा था. नूतन की अपनी मां, मशहूर एक्ट्रेस शोभना समर्थ, की तरह स्क्रीन पर छाने की चाहत तो थी, लेकिन उनके अपने ही परिवार और जान-पहचान वाले उनके रंग-रूप को लेकर कड़वी बातें कहते थे. यहाँ तक कि उनकी मां की एक सहेली ने नूतन के मुंह पर कह दिया था कि वह अपनी मां की तरह सुंदर नहीं हैं. इन बातों ने नूतन के मन में गहरी हीन भावना भर दी थी, जिससे उबरना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था.
मुश्किल दौर में नूतन की मां शोभना समर्थ ढाल बनकर खड़ी हुईं और अपनी बेटी के आत्मविश्वास को जगाने के लिए कड़ी मेहनत की. उन्होंने नूतन को पढ़ाई के लिए विदेश भेजा, उनके वजन पर काम किया और यहाँ तक कि उन्हें लॉन्च करने के लिए खुद फिल्म भी बनाई. नूतन ने बतौर बाल कलाकार अपना सफर शुरू किया और जैसे-जैसे वह सफल होती गईं, उन रिश्तेदारों और जानकारों के सुर भी बदलने लगे जो पहले उन्हें ताने देते थे. एक हैरान करने वाला किस्सा यह भी है कि महज 14 साल की उम्र में नूतन को फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में अनारकली जैसा ऐतिहासिक रोल ऑफर हुआ था, लेकिन खुद को लेकर कम आत्मविश्वास की वजह से उन्होंने इस बड़े मौके को ठुकरा दिया. उन्हें लगता था कि वह उस किरदार के लिए फिट नहीं दिखती हैं.
फिल्म ‘सीमा’ से की धमाकेदार वापसी
नूतन ने अपनी झिझक को दूर करने के लिए एक्टिंग और अपनी पर्सनालिटी पर काम करने के लिए विदेश जाने का साहसी फैसला लिया. स्विट्जरलैंड में पढ़ाई के दौरान उन्होंने न केवल अपनी अंग्रेजी सुधारी, बल्कि एक नई सोच और कॉन्फिडेंस के साथ भारत लौटीं. 1955 में फिल्म ‘सीमा’ से उनकी धमाकेदार वापसी हुई, जिसने बॉलीवुड में सादगी और संजीदा अभिनय के नए मायने तय किए. इसके बाद नूतन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार चार दशकों तक इंडस्ट्री पर राज किया. उन्होंने साबित कर दिया कि खूबसूरती केवल चेहरे के रंग में नहीं, बल्कि टैलेंट और खुद पर यकीन करने में होती है. आज भी ‘बंदिनी’ और ‘सुजाता’ जैसी फिल्मों में उनकी मासूमियत और अभिनय की गहराई को कोई मात नहीं दे सकता.
About the Author
अभिषेक नागर News 18 Digital में Senior Sub Editor के पद पर काम कर रहे हैं. वे News 18 Digital की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. वे बीते 6 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे News 18 Digital से पहल…और पढ़ें