Planets effect on human life। ग्रहों का मानव जीवन पर प्रभाव

Share to your loved once


How Planet Affect Human: रात के आसमान को देखते हुए अक्सर मन में एक सवाल उठता है-हम पृथ्वी पर रहते हैं, हमारी रोजमर्रा की चिंताएं, फैसले और भावनाएं यहीं बनती-बिगड़ती हैं, फिर लाखों-करोड़ों किलोमीटर दूर घूमते ग्रह हमारे जीवन पर असर कैसे डाल सकते हैं? ज्योतिष मानने वाले कहते हैं कि ग्रह-नक्षत्र केवल खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि ऊर्जा के स्रोत हैं जो मनुष्य के शरीर, मन और भाग्य को प्रभावित करते हैं. वहीं विज्ञान का नजरिया अलग है, लेकिन कुछ प्राकृतिक घटनाएं-जैसे चंद्रमा का ज्वार-भाटा पर प्रभाव-इस चर्चा को और रोचक बना देती हैं. नवग्रहों को लेकर फैली धारणाओं और वास्तविक समझ के बीच की दूरी आज भी कायम है. तो आखिर ग्रहों की चाल और मानव जीवन के बीच यह रिश्ता कैसे समझा जाए? इसी जिज्ञासा के जवाब तलाशती है यह रिपोर्ट.

ग्रहों की ऊर्जा और जीवन का संतुलन
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पृथ्वी पर जीवन को चलाने के लिए तीन मुख्य ऊर्जाएं जरूरी मानी गई हैं-ध्वनि, ऊष्मा और प्रकाश. ध्वनि ऊर्जा हम वातावरण और शरीर की गतिविधियों से पा लेते हैं, लेकिन प्रकाश और ऊष्मा के लिए मनुष्य पूरी तरह सूर्य पर निर्भर है. यही कारण है कि सूर्य को जीवनदाता कहा जाता है. ज्योतिष की परंपरा में नवग्रह-सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु-मानव जीवन की अलग-अलग प्रवृत्तियों से जोड़े जाते हैं. मान्यता है कि इन ग्रहों से आने वाली ऊर्जा शरीर की जैविक और मानसिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है. उदाहरण के तौर पर सूर्य को आत्मबल और स्वास्थ्य से, चंद्रमा को मन और भावनाओं से, मंगल को रक्त और साहस से जोड़ा जाता है.

चंद्रमा का घटता-बढ़ता प्रकाश और मन का उतार-चढ़ाव
चंद्रमा पृथ्वी का सबसे निकटतम खगोलीय पड़ोसी है, इसलिए उसके प्रभाव को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती है. खगोलीय गणना बताती है कि चंद्रमा प्रतिदिन लगभग 12 अंश सूर्य से दूर या पास होता है. जब वह सूर्य से दूर जाता है तो उसका प्रकाशित हिस्सा कम होता जाता है और अमावस्या की रात लगभग अदृश्य हो जाता है. वहीं सूर्य के करीब आते-आते वही चंद्रमा पूर्णिमा की रात पूर्ण चमक में दिखता है. ज्योतिष में कहा जाता है कि जितना अधिक चंद्रमा का प्रकाश पृथ्वी पर परावर्तित होता है, उतना ही मनुष्य के मन और व्यवहार पर उसका प्रभाव बढ़ता है. ग्रामीण इलाकों में आज भी बुजुर्ग कहते मिल जाते हैं कि पूर्णिमा के दिनों में बेचैनी, अनिद्रा या भावनात्मक उतार-चढ़ाव ज्यादा महसूस होते हैं. आधुनिक मनोविज्ञान में इस पर मतभेद हैं, लेकिन यह धारणा लोकविश्वास का हिस्सा बनी हुई है.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

ज्वार-भाटा से जुड़ा उदाहरण
समुद्र में आने वाला ज्वार-भाटा चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से जुड़ा है-यह विज्ञान द्वारा प्रमाणित तथ्य है. इसी उदाहरण को आधार बनाकर ज्योतिष में कहा जाता है कि जब चंद्रमा विशाल समुद्र के जल को प्रभावित कर सकता है, तो मानव शरीर-जिसमें लगभग 60 प्रतिशत पानी होता है-उससे अछूता कैसे रह सकता है. इसी तर्क के आधार पर चंद्रमा को शरीर के जल तत्व और मंगल को रक्त से जोड़ा जाता है. ज्योतिष ग्रंथों में कहा गया है कि इन दोनों ग्रहों की स्थिति मनुष्य के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर असर डालती है.

जन्मकुंडली: ग्रहों की स्थिति का मानचित्र
ज्योतिष में जन्मकुंडली को एक तरह का आकाशीय नक्शा माना जाता है. जन्म के समय ग्रह किस कोण और दिशा में थे, यह कुंडली में दर्ज होता है. प्रत्येक भाव 30 अंश का माना जाता है, जो ग्रहों के झुकाव और सूर्य से उनके संबंध को दर्शाता है. मान्यता है कि ग्रहों का जितना अधिक प्रकाश या ऊर्जा पृथ्वी की ओर परावर्तित होती है, वे उतने ही “शक्तिशाली” माने जाते हैं. उदाहरण के तौर पर यदि जन्म के समय चंद्रमा मजबूत स्थिति में है तो व्यक्ति भावनात्मक रूप से स्थिर माना जाता है, जबकि शनि का प्रभाव अधिक होने पर जीवन में संघर्ष और अनुशासन बढ़ने की बात कही जाती है.
हालाँकि वैज्ञानिक समुदाय इसे प्रतीकात्मक या सांस्कृतिक मान्यता मानता है, लेकिन सामाजिक व्यवहार में कुंडली का महत्व आज भी कायम है-शादी, करियर या नामकरण तक में.

विश्वास, अनुभव और धारणा का मिश्रण
भारत जैसे समाज में ज्योतिष केवल भविष्य बताने का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है. गांवों में किसान आज भी बोआई या फसल कटाई के समय चंद्रमा की स्थिति देखते हैं. कई लोग यात्रा, व्यापार या नए काम की शुरुआत “शुभ ग्रह स्थिति” देखकर करते हैं. दिल्ली की एक आईटी प्रोफेशनल पूजा शर्मा बताती हैं, “मैं ज्योतिष पर पूरी तरह निर्भर नहीं हूं, लेकिन कई बार कुंडली मिलान या ग्रह दशा देखकर फैसले लेने से मानसिक भरोसा मिलता है.” यही भरोसा ज्योतिष की सामाजिक भूमिका को समझाता है-यह वैज्ञानिक सत्य से ज्यादा मनोवैज्ञानिक सहारा भी है.

गलतफहमियां और संतुलित समझ की जरूरत
ग्रहों के प्रभाव को लेकर कई अतिशयोक्त धारणाएं भी फैली हैं-जैसे हर समस्या का कारण शनि या राहु को मान लेना. विशेषज्ञ कहते हैं कि ज्योतिष को नियति का अंतिम निर्णय मानना सही नहीं. वास्तविकता यह है कि ग्रहों का प्रभाव मानना या न मानना व्यक्तिगत विश्वास का विषय है, लेकिन यह भी सच है कि सूर्य और चंद्रमा जैसे खगोलीय पिंड पृथ्वी पर भौतिक प्रभाव डालते हैं. इसी वास्तविकता और विश्वास के बीच ज्योतिष की अवधारणा विकसित हुई है.

आकाश और मानव के बीच प्रतीकात्मक रिश्ता
आखिरकार ग्रहों और मानव जीवन का संबंध केवल दूरी से नहीं, अर्थ से तय होता है. आकाश में घूमते ग्रह हमें समय, चक्र और प्रकृति की लय का एहसास कराते हैं. चाहे इसे ऊर्जा का प्रभाव मानें या सांस्कृतिक प्रतीक-ग्रहों की अवधारणा मानव सोच और जीवन दर्शन का हिस्सा रही है. इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्रह सीधे जीवन बदलते हों या नहीं, लेकिन उनके प्रति विश्वास निश्चित रूप से मनुष्य के निर्णय और दृष्टिकोण को प्रभावित करता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

GET YOUR LOCAL NEWS ON NEWS SPHERE 24      TO GET PUBLISH YOUR OWN NEWS   CONTACT US ON EMAIL OR WHATSAPP