10 महीने में सरकार ने लिया 13.65 लाख करोड़ का कर्ज, किसने दिया सबसे ज्यादा पैसा, आरबीआई ने किया खुलासा
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Government Borrowing : रिजर्व बैंक ने आंकड़े जारी कर बताया है कि सरकार ने पिछले साल अप्रैल से इस साल फरवरी तक बाजार से करीब 13.65 लाख करोड़ रुपये का उधार बॉन्ड के जरिये लिया है. इसमें से 47 फीसदी बॉन्ड तो अकेले आरबीआई ने ही खरीद डाले हैं. रिजर्व बैंक से यह भी पता चला है कि सरकारी प्रतिभूतियों की खरीदारी से बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी भी आई है.

रिजर्व बैंक ने 47 फीसदी सरकारी प्रतिभूतियां खरीदी हैं.
नई दिल्ली. बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी को सपोर्ट करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्तवर्ष 2025-26 में अब तक केंद्र सरकार के कुल बॉन्ड इश्यू का 47 फीसदी सरकारी प्रतिभूतियां खरीदी हैं. आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार ने 4 अप्रैल 2025 से 13 फरवरी 2026 तक अपने ग्रॉस बॉरोइंग प्रोग्राम के तहत सरकारी प्रतिभूतियां जारी कर 13,65,000 करोड़ रुपये जुटाए. इसी दौरान, आरबीआई ने ओपन मार्केट ऑपरेशंस (ओएमओ) के तहत 6,39,203 करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियां खरीदीं, जिससे बैंकिंग सिस्टम में स्थायी लिक्विडिटी आई.
सरकार की लगातार उधारी के बीच आरबीआई की यह बड़ी खरीदारी हुई, जो आमतौर पर बैंकिंग सिस्टम से लिक्विडिटी को खींच लेती है और बॉन्ड यील्ड पर दबाव डालती है. विशेषज्ञों के मुताबिक, आरबीआई ने सेकंडरी मार्केट से बॉन्ड खरीदकर लिक्विडिटी बढ़ाई और बाजार की स्थिति को स्थिर बनाए रखा. इस कदम से बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की कमी से राहत मिली और भारी मात्रा में सरकारी प्रतिभूतियों की आपूर्ति के बावजूद यील्ड में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई. इससे क्रेडिट ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए सिस्टम में पर्याप्त फंड भी उपलब्ध रहे.
क्या हुआ इस खरीदारी से फायदा
बंधन एएमसी में फिक्स्ड इनकम के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बृजेश शाह ने बताया कि आरबीआई के ओएमओ खरीदारी से कोर लिक्विडिटी बनी रही, खासकर उस समय जब पूंजी का बहिर्वाह और रुपये पर दबाव के चलते आरबीआई को डॉलर बेचने पड़े. आरबीआई द्वारा अपनाए गए विभिन्न उपायों, जैसे ओएमओ खरीदारी ने स्थायी लिक्विडिटी दी और वैश्विक बाजार के दबाव को कम किया.
ट्रेड डील से सुधर सकता है माहौल
उन्होंने कहा कि हाल ही में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के चलते पूंजी प्रवाह में सकारात्मक माहौल बन सकता है, जिससे विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप की जरूरत कम होगी और ओएमओ की आवश्यकता भी घट सकती है. वित्तवर्ष 2025-26 के अधिकांश समय में लिक्विडिटी सरप्लस रही, कुछ समय के लिए यह घाटे में भी गई. दिसंबर 2025 से आरबीआई ने ओएमओ खरीदारी बढ़ा दी, जब लिक्विडिटी में कमी आनी शुरू हुई और सिस्टम घाटे में चला गया. आरबीआई के हस्तक्षेप से बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी बढ़ी, जिससे मनी मार्केट रेट्स काबू में रहे और ओवरनाइट रेट्स रेपो रेट के करीब रहे.
कितनी पहुंच गई बॉन्ड यील्ड
जनवरी 2025 से बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव रहा, जिसकी वजहें थीं- भू-राजनीतिक परिस्थितियों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, ब्याज दरों में कटौती चक्र के अंत की उम्मीद और अंत में सरकार द्वारा बजट में घोषित वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अनुमान से ज्यादा ग्रॉस बॉरोइंग. बावजूद इसके 10 साल की बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड जनवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच 6.30-6.70 फीसदी के दायरे में रही. सरकार ने वित्तवर्ष 2026-27 के लिए 17.2 लाख करोड़ रुपये उधार लेने की योजना बनाई है, जो बाजार के अनुमान 16.5-17 लाख करोड़ रुपये से काफी ज्यादा है, जिससे सरकारी प्रतिभूतियों की यील्ड में तेज बढ़ोतरी हुई.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें