मोहम्मद यूनुस जाते-जाते भी कैसे बढ़ा गए तारिक रहमान की मुसीबत, चिकन नेक पर चीन को थमा दिया कौन सा हथियार?

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बांग्लादेश में आज नई सरकार का गठन होने वाला है. मोहम्मद तारिक रहमान मंगलवार शाम प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे. शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के बाद सरकार की बागडोर संभाल रहे मोहम्मद यूनुस ने सोमवार को कार्यवाहक प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन सत्ता से विदाई के साथ दिया गया उनका बयान नई सियासी और कूटनीतिक बहस को जन्म दे गया है. यूनुस के इस बयान को भारत-बांग्लादेश संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है. मोहम्मद यूनुस ने जाते-जाते ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया है, जिससे न सिर्फ भारत असहज हुआ है, बल्कि बांग्लादेश की अगली सरकार और खासकर मोहम्मद तारिक रहमान की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं. भारत-बांग्लादेश संबंधों को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिशों में मोहम्मद यूनुस का गढ़ा यह नैरेटिव बड़ा रोड़ा साबित हो सकता है.

अपने विदाई भाषण में मोहम्मद यूनुस ने कहा कि बांग्लादेश का ‘खुला समंदर’ सिर्फ उसकी भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने का दरवाजा है. उन्होंने नेपाल, भूटान और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को एक साथ जोड़ते हुए ‘सेवन सिस्टर्स’ शब्द का इस्तेमाल किया, लेकिन जानबूझकर भारत का नाम नहीं लिया. पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा को सामूहिक रूप से सेवन सिस्टर्स कहा जाता है.

भारत का नाम लिए बिना सेवन सिस्टर्स का जिक्र करना कई सवाल खड़े करता है. कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ शब्दों का चयन नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक संदेशबाजी है. यूनुस पहले भी इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर चुके हैं. पिछले साल चीन दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि सेवन सिस्टर्स ‘लैंडलॉक्ड’ हैं और उनका समंदर से कोई सीधा संपर्क नहीं है, जबकि बांग्लादेश इस पूरे क्षेत्र के लिए ‘गार्जियन’ की भूमिका निभा सकता है.

चीन को थमाया कैसा हथियार?

यूनुस की यह बात चीन को एक नया ‘हथियार’ सौंपने के रूप में देखा जा रहा है. सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, यूनुस का यह नैरेटिव चीन, पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को यह संकेत देता है कि भारत का पूर्वोत्तर एक अलग आर्थिक-राजनीतिक इकाई की तरह देखा जा सकता है, जिसे समुद्री व्यापार के जरिये नए सिरे से जोड़ा जा सकता है. इससे भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता और रणनीतिक स्थिति पर सवाल खड़े करने की कोशिश मानी जा रही है.

इस बयान पर पहले भी कड़ी प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है. पीएम मोदी के आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने भी सवाल उठाया था कि चीन को निवेश के लिए आमंत्रित करने के लिए भारत के सात राज्यों के लैंडलॉक्ड होने को आधार बनाना किस मक़सद से किया जा रहा है.

चिकन नेक क्यों इतना अहम?

दरअसल, भारत का पूर्वोत्तर इलाका रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है, खासकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर की वजह से. महज लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा यह गलियारा ही पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से जमीनी तौर पर जोड़ता है. बांग्लादेश और नेपाल इस कॉरिडोर के साथ सीमा साझा करते हैं, जबकि भूटान और चीन भी इससे कुछ ही किलोमीटर दूर हैं. चीन पहले से ही अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता रहा है और उसे ‘दक्षिणी तिब्बत’ कहता है, जिससे इस क्षेत्र की संवेदनशीलता और बढ़ जाती है.

यूनुस ने कैसे बढ़ाई तारिक रहमान की मुसीबत?

इसी पृष्ठभूमि में यूनुस का बयान सिर्फ आर्थिक सहयोग की बात नहीं रह जाता, बल्कि उसे क्षेत्रीय भू-राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. खुफिया सूत्रों के मुताबिक, विदाई के वक्त ऐसा बयान देकर यूनुस ने बांग्लादेश को एक ‘सेंट्रल गेटवे’ के रूप में पेश करने की कोशिश की है, जो लैंडलॉक्ड पड़ोसियों को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ सकता है. यह नैरेटिव पारंपरिक क्षेत्रीय संतुलन को चुनौती देता है और अप्रत्यक्ष रूप से चीन को रणनीतिक बढ़त देने का माध्यम बन सकता है.

मोहम्मद तारिक रहमान की सरकार को अब इस बयान के अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय असर से निपटना होगा, खासकर भारत के साथ संबंधों को संतुलित रखते हुए. भारत-बांग्लादेश संबंधों में व्यापार और सुरक्षा दोनों ही स्तरों पर गहरी निर्भरता है. बांग्लादेश की लगभग 94 प्रतिशत सीमा भारत से लगती है और वह व्यावहारिक रूप से ‘इंडिया-लॉक्ड’ देश है. वहीं, पूर्वोत्तर भारत के लिए बांग्लादेश सस्ता और सुलभ संपर्क मार्ग भी उपलब्ध कराता है.

ऐसे में यूनुस का विदाई भाषण एक साधारण बयान नहीं, बल्कि एक ऐसा रणनीतिक संदेश माना जा रहा है, जिसने चीन को कूटनीतिक लाभ का एक औजार थमा दिया है और बांग्लादेश की आने वाली राजनीतिक नेतृत्व के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

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