Masaan Holi Varanasi Mystery of Nagar Vadhu Dance। काशी की मसान होली में जलती चिताओं के बीच नगरवधुओं का नृत्य क्यों होता है
Masan Holi Varanasi: भारत में होली का मतलब आमतौर पर रंग, गुलाल और मस्ती से भरा उत्सव होता है, लेकिन काशी में होली का एक ऐसा रूप भी है, जिसे देखकर पहली बार कोई भी ठिठक जाए. यहां रंगों की जगह राख उड़ती है, ढोल की थाप श्मशान की चिताओं के बीच गूंजती है और नगरवधुएं जलती चिताओं के सामने नृत्य करती दिखाई देती हैं. इसे मसान होली कहा जाता है – एक ऐसा पर्व, जिसमें जीवन और मृत्यु का अंतर जैसे मिट जाता है. यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक आत्मा का हिस्सा है. यहां होली उत्सव भी है और वैराग्य का संदेश भी. हर साल हजारों लोग इस अनोखी होली को देखने आते हैं, पर इसके पीछे छिपी मान्यताएं और दर्शन बहुत कम लोग समझ पाते हैं. आखिर क्यों जलती चिताओं के बीच नृत्य होता है और क्यों राख से होली खेली जाती है – यही है इस परंपरा का रहस्य.
काशी में मसान होली की परंपरा क्या है?
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर मनाई जाने वाली मसान होली दुनिया की सबसे अनोखी होली मानी जाती है. यहां लोग गुलाल नहीं, बल्कि चिता की राख से होली खेलते हैं. ढोल-नगाड़ों के बीच अघोरी साधु और स्थानीय लोग भस्म उड़ाते हैं. इस दौरान नगरवधुओं का नृत्य भी होता है, जो परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. श्मशान, जो सामान्यतः शोक का स्थान माना जाता है, उस दिन उत्सव स्थल बन जाता है. यह दृश्य विरोधाभास से भरा होता है – एक ओर मृत्यु, दूसरी ओर उत्सव.
शिव और उनके गणों से जुड़ी कथा
रंगभरी एकादशी से शुरू होती है परंपरा
मान्यता है कि महाशिवरात्रि के बाद भगवान शिव माता पार्वती को काशी लाते हैं. रंगभरी एकादशी पर नगर में रंगों की होली खेली जाती है, लेकिन शिव के गण -भूत, प्रेत और अघोरी – इस सामाजिक उत्सव में शामिल नहीं हो पाते.
शिव स्वयं श्मशान में खेलते हैं भस्म होली
कथा के अनुसार शिव अपने गणों को उपेक्षित न रहने देने के लिए श्मशान में उनके साथ चिता की राख से होली खेलते हैं. यही परंपरा आगे चलकर मसान होली बनी. इसलिए काशी में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि शिव के समभाव और स्वीकार का प्रतीक भी है.
नगरवधुओं का नृत्य: मुक्ति की कामना
परंपरा और प्रतीक का मेल
मसान होली में नगरवधुओं का नृत्य सदियों पुरानी लोक परंपरा माना जाता है. यह केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रतीक है.
मोक्ष की मान्यता से जुड़ा विश्वास
स्थानीय मान्यता के अनुसार, श्मशान में जलती चिताओं के सामने नृत्य करने से उन्हें अगले जन्म में इस जीवन से मुक्ति मिलती है. यह नृत्य शिव के गणों और श्मशान संस्कृति के प्रति सम्मान का रूप माना जाता है. कहा जाता है कि यह नृत्य मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि की कामना का अनुष्ठान है.
राख से होली: मृत्यु का दर्शन
काशी की मसान होली जीवन की नश्वरता का प्रतीक है. जहां बाकी जगह रंग जीवन की खुशी दर्शाते हैं, वहीं यहां राख जीवन के अंत की याद दिलाती है. यह संदेश देता है कि अंततः सब कुछ भस्म हो जाता है – अहंकार, पहचान, वैभव और शरीर.
अघोरी परंपरा में श्मशान को साधना का सर्वोच्च स्थान माना जाता है. इसलिए इस दिन विशेष साधनाएं भी की जाती हैं. मसान होली इस विचार को जीवित रखती है कि मृत्यु भय नहीं, सत्य है -और सत्य का उत्सव भी हो सकता है.
महिलाओं का प्रवेश सीमित क्यों माना गया?
परंपरागत रूप से श्मशान को तीव्र आध्यात्मिक ऊर्जा का स्थल माना गया है. कई मान्यताओं के अनुसार यह वातावरण संवेदनशील मन पर प्रभाव डाल सकता है. इसी कारण पुराने समय में महिलाओं को श्मशान से दूर रखा गया. हालांकि आधुनिक समय में यह परंपरा धीरे-धीरे बदल भी रही है, लेकिन मसान होली के दौरान कुछ क्षेत्रों में अब भी सीमाएं देखी जाती हैं. यह मान्यता सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से जुड़ी है, न कि किसी सामाजिक निषेध के रूप में.
मृत्यु के बीच जीवन का उत्सव
काशी की मसान होली विरोधाभासों का उत्सव है. यहां मृत्यु भी है और उत्सव भी. राख भी है और नृत्य भी. यह पर्व याद दिलाता है कि जीवन क्षणभंगुर है, लेकिन स्वीकार ही मुक्ति का मार्ग है. सामान्य होली जीवन की खुशी का उत्सव है, जबकि मसान होली जीवन के अंतिम सत्य को स्वीकार करने का उत्सव है. यही कारण है कि काशी की यह परंपरा दुनिया भर में जिज्ञासा और श्रद्धा दोनों का विषय बनी हुई है.