Mahashivratri 2026 who is Shiva Celebrate the great night of Lord Shiva according to Gurudev Sri Sri Ravi Shankar | शिव ना व्यक्ति ना देव, ना प्रकाश… ना अंधकार, महाशिवरात्रि पर जानें कौन हैं शिव?
गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर
पृथ्वी से आरंभ करते हुए शिव-तत्त्व तक कुल 36 तत्त्व माने गए हैं. तत्त्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश—इस प्रकार आगे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि गिनते हुए अंततः यह अस्तित्व शिव-तत्त्व पर आकर स्थिर होता है. शिव-तत्त्व सभी तत्त्वों में व्याप्त है. शिव आकाश जैसे हैं, उनसे पृथक होने का कोई उपाय ही नहीं है. जैसे आकाश-तत्त्व जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु—सभी तत्त्वों में व्याप्त है, उसी प्रकार शिव-तत्त्व सृष्टि में उपस्थित सभी तत्त्वों में व्याप्त है. इसी कारण शिव को चिदाकाशरूपम् कहा गया है. शिव से कोई कभी अलग हो ही नहीं सकता, क्योंकि वे सर्वव्यापी हैं. उनसे कोई छिप भी नहीं सकता, क्योंकि वे सर्वज्ञ हैं.
समय का बोध नहीं रहता
संसार में हर वस्तु भूत, वर्तमान और भविष्य, इन तीन कालों में बंधी रहती है. ये तीनों काल सब कुछ बदलते रहते हैं. इस जगत में सब कुछ काल के अधीन है, लेकिन शिव काल के परे हैं—वे काल के अधिपति हैं. इसलिए शिव को महाकाल कहा गया है. दुःख में समय बहुत लंबा लगता है, सुख में समय बहुत छोटा. प्रेम में तो समय का प्रवाह ही अनुभव में नहीं आता. गहरी नींद (तमोगुण) में भी काल का कोई बोध नहीं होता. जब हम सपनों में खो जाते हैं, तब भी समय का बोध नहीं रहता.
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीन अवस्थाओं के परे जो तुरीय अवस्था है, वही ध्यान की अवस्था है. जब हम ध्यान में जाते हैं और महाकाल से जुड़ते हैं, तब अनंत काल की अनुभूति एक क्षण में प्राप्त हो जाती है. उस क्षण में वर्तमान की गहराई और उसका विस्तार अनुभव में आते हैं. वर्तमान केवल एक क्षण नहीं है, वर्तमान की गहराई में अनंत काल समाहित है. शिव के बारे में एक सामान्य भ्रांति यह है कि शिव एक पुरुष या योगी थे, जो दस या 15000 वर्ष पहले रहते थे, यह निरर्थक धारणा है. शिव एक तत्त्व है. शिव कोई व्यक्ति नहीं थे. शिव को कभी भी समय की सीमा में न बांधें. शिव को महाकाल कहा जाता है, काल का भी काल और सभी कारणों का कारण.
शिव एक सिद्धांत है, ऊर्जा और चेतना. शिव कभी ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो इस धरती पर रहे. उसी प्रकार, कैलाश कोई साधारण पर्वत नहीं है. ‘कैलाश’ का अर्थ क्या है? ‘लास’ शब्द का अर्थ है, उत्सव, उत्साह, आनंद. कैलाश का अर्थ है, वह स्थान जहां केवल उत्सव और आनंद है. जब आपके भीतर शिव-तत्त्व का उदय होता है, तो आपका जीवन उत्सव बन जाता है. जहाँ उत्सव है, वहीं शिव-तत्त्व निवास करता है, खिलता है और प्रकट होता है.
शिव के पांच रूप या कार्य हैं, सृष्टि, स्थिति और संहार. अनुग्रह—जिसका अर्थ है आशीर्वाद, कृपा या करुणा; तथा तिरोभाव, जिसका अर्थ है अव्यक्त रूप में रहना. ये पांचों पञ्चकृत्य हैं, जो चेतना में घटित होते हैं. चेतना हर समय मौजूद रहती है, लेकिन कभी सक्रिय होती है और कभी सुप्त. ऊर्जा वहीं रहती है, जैसे बिजली हर समय मौजूद होती है, लेकिन जब स्विच बंद कर दिया जाता है, तो वह सुप्त हो जाती है. वह तब भी वहीं होती है, पर प्रकाश नहीं आता क्योंकि वह तिरोभाव में होती है—ढकी हुई रहती है. जब स्विच चालू किया जाता है, तो बिजली प्रकट हो जाती है.
चेतना की यही अभिव्यक्ति पूरी सृष्टि है. यही शिव का तांडव (नृत्य) है. आप कभी भी नर्तक और नृत्य को अलग नहीं कर सकते. नर्तक चेतना (पुरुष) है और नृत्य प्रकृति (स्त्री). ये दोनों साथ-साथ होते हैं. आनंद तांडव, शिव के अनेक तांडवों में से एक है, जो आनंद की तरंगों का प्रतीक है. ये तरंगें तब उत्पन्न होती हैं, जब शिव-तत्त्व को अपने भीतर स्वीकार किया जाता है, अनुभव किया जाता है.
शिव-सिद्धांत को केवल तर्कबुद्धि से नहीं समझा जा सकता. यह एक अनुभवजन्य सत्ता है, जो बुद्धि से परे है. हर वर्ष बारह शिवरात्रियां होती हैं, हर मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को. लेकिन फाल्गुन मास में आने वाली शिवरात्रि, जिसे महाशिवरात्रि कहा जाता है, अत्यंत विशेष मानी जाती है. रात्रि अनंतता का दर्शन कराती है. रात्रि में आप देखते हैं—कितने ब्रह्मांड हैं, कितने तारे हैं. सृष्टि की महिमा रात्रि में दिखाई देती है. जैसे रात आपको अपनी गोद में लेकर सुकून देती है, वैसे ही समाधि है. यही शिवरात्रि का अर्थ है—भीतर से जागे रहो और स्वयं में विश्राम करो.
शिवरात्रि वह समय है जब आप अपने अस्तित्व में विश्राम करते हैं. जाग्रत अवस्था में हम व्यस्त रहते हैं और सकारात्मक या नकारात्मक अनेक भावनाओं तथा परिस्थितियों में उलझे रहते हैं. निद्रा हमें सभी प्रकार की भावनाओं और उलझनों से मुक्त कर देती है, किंतु तब हम जड़ता में चले जाते हैं.
इन दोनों के अतिरिक्त एक ऐसी अवस्था भी है, जब आप सचेत रूप से अपने अस्तित्व में विश्राम करते हैं. तब आप उस महान तत्त्व से साक्षात्कार करते हैं—जो विराट है, सार्वभौमिक है, जिसकी कोई सीमा नहीं, कोई समय नहीं. ध्यान ही शिव-तत्त्व, शिव-सिद्धांत तक ले जाता है. एक क्षण के लिए आप पूरे संसार को—सारी गतिविधियों को—क्षणभंगुर, अस्थायी देखते हैं, जैसे कोई सपना. और जब सब कुछ सपने जैसा दिखने लगता है, तब आप अपनी वास्तविकता को पहचानते हैं—कि आप वही असीम चेतना हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं. और इसकी शुरुआत होती है शून्यता से.
इस दिन ध्यान में बैठना और ॐ नमः शिवाय का जप करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत लाभकारी होता है. इस समय किया गया ध्यान अत्यंत सजीव और शक्तिशाली होता है, जिससे अस्तित्व के साथ गहरा जुड़ाव महसूस होता है. शिवरात्रि मल, आवरण और विक्षेप—अर्थात् मन की अशुद्धियों और आत्मा पर पड़े आवरणों—को दूर करती है. यह वह दिन है जब वह आवरण शिथिल हो जाता है और आप उस सत्य की झलक पा सकते हैं, जो मानवीय समझ से परे है.