परिणीता, पिंजर, लज्जा: महिला किरदारों की संवेदनशील कहानियां
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हिंदी साहित्य की कई रचनाओं पर बनी फिल्मों में महिलाओं की ताकत, संघर्ष और भावनाओं को बहुत असरदार तरीके से दिखाया गया है. ये फिल्में उपन्यासों और कहानियों से प्रेरित होती हैं और उनमें ऐसे महिला किरदार होते हैं, जो समाज की बुराइयों से लड़ते हैं, प्यार और त्याग की मिसाल पेश करते हैं और अपनी आज़ादी के लिए आवाज उठाते हैं. हर साल 13 फरवरी को राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. यह दिन महान कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक सरोजिनी नायडू की जयंती के रूप में मनाया जाता है. आज इस मौके पर बॉलीवुड की उन फिल्मों के बारे में बताते हैं जो महिलाओं पर केंद्रित हैं.
साल 2005 में रिलीज हुई फिल्म परिणीता भारतीय सिनेमा की उन खूबसूरत और संवेदनशील प्रेम कहानियों में गिनी जाती है, जो समय के साथ और भी प्रासंगिक होती गईं. यह फिल्म महान साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के इसी नाम के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित है. फिल्म में विद्या बालन ने ललिता का किरदार निभाया, जो उनके करियर की सबसे यादगार भूमिकाओं में से एक माना जाता है.
कहानी 1960 के दशक के कोलकाता की पृष्ठभूमि पर आधारित है और एक मासूम, गहरी और भावनात्मक प्रेम कहानी को दर्शाती है. ललिता एक अनाथ लड़की है, जो अपने रिश्तेदारों के घर में रहती है और आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद आत्मसम्मान से भरी हुई है. उसका रिश्ता बचपन के दोस्त शेखर से धीरे-धीरे प्यार में बदल जाता है, लेकिन समाज की बंदिशें, परिवारों के बीच आर्थिक और सामाजिक फर्क, और दहेज जैसी कुरीतियां उनके रिश्ते के रास्ते में बड़ी बाधा बन जाती हैं.
साल 2003 में रिलीज हुई ‘पिंजर’ भारतीय सिनेमा की उन संवेदनशील फिल्मों में गिनी जाती है, जो इतिहास के दर्दनाक अध्याय को मानवीय दृष्टि से सामने लाती हैं. यह फिल्म प्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है और भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि में महिलाओं की त्रासदी को बेहद मार्मिक तरीके से दर्शाती है.
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फिल्म की कहानी ‘पुरो’ नाम की एक हिंदू लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार उर्मिला मातोंडकर ने बेहद प्रभावशाली ढंग से निभाया है. पुरो एक सामान्य, खुशहाल जीवन जीने के सपने देखती है, लेकिन विभाजन के हिंसक माहौल में उसका अपहरण हो जाता है. इसके बाद उसका जीवन पूरी तरह बदल जाता है. समाज, परिवार और परिस्थितियां उसे ऐसे मोड़ पर खड़ा कर देती हैं, जहां उसे अपनी पहचान, सम्मान और अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता है. इस फिल्म को 2 नेशनल अवॉर्ड मिला था.
साल 2001 में रिलीज हुई लज्जा भारतीय सिनेमा की उन महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है, जो समाज में महिलाओं की स्थिति पर तीखा और संवेदनशील सवाल उठाती हैं. यह फिल्म किसी एक पुस्तक की सीधी कहानी पर आधारित नहीं है, लेकिन इसका शीर्षक और मूल विचार बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के साल 1993 में प्रकाशित चर्चित उपन्यास “लज्जा” से प्रेरित माना जाता है.
निर्देशक राजकुमार संतोषी ने इस फिल्म के जरिए समाज के अलग-अलग वर्गों में मौजूद महिलाओं की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान की लड़ाई को चार प्रमुख महिला किरदारों की कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किया है. फिल्म की कहानी एक गर्भवती महिला के भागने से शुरू होती है, जो घरेलू हिंसा और लालच से भरे रिश्ते से अपनी जान बचाना चाहती है. उसकी यात्रा के दौरान उसे कई महिलाएँ मिलती हैं, जिनकी जिंदगी भी शोषण, अन्याय और सामाजिक दबाव से जूझ रही होती है.
भगवती चरण वर्मा के उपन्यास पर बनी क्लासिक फिल्म चित्रलेखा साल 1964 में आई थी, जो पाप-पुण्य की बहस को एक नर्तकी के माध्यम से उठाती है. फिल्म में मीना कुमारी ने चित्रलेखा का दमदार रोल निभाया, जो समाज की नैतिकता और स्त्री की स्वतंत्र इच्छा के बीच संघर्ष करती है. फिल्म दार्शनिक गहराई के साथ नारी शक्ति दिखाती है.
‘साहब बीबी और गुलाम’ साल 1962 में रिलीज हुई थी, बिमल मित्र के उपन्यास पर गुरुदत्त की क्लासिक फिल्म में मीना कुमारी ने छोटी बहू का किरदार निभाया. फिल्म बंगाली जमींदारी व्यवस्था में फंसी एक महिला की व्यथा और संघर्ष दिखाती है, जो समय के साथ बदलते समाज में अपनी पहचान खोती है.