बीएनपी की जीत से भारत-बांग्लादेश संबंधों में बदलाव संभव

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Bangladesh-India Relations: बांग्लादेश में गुरुवार यानी 12 फरवरी को हुए ऐतिहासिक आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) बड़ी जीत की ओर बढ़ रही है. बीएनपी का नेतृत्व पूर्व पीएम दिवंगत खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के हाथों में है. रिपोर्ट्स के मुताबिक बीएनपी और उसके सहयोगियों को 300 सदस्यीय संसद में 200 से अधिक सीटें मिलती दिख रही है. जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन को करीब 70 सीटें मिल सकती हैं. यह चुनाव 2024 के छात्रों के नेतृत्व वाले आंदोलन के कारण शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद पहला बड़ा लोकतांत्रिक परीक्षण था.

चुनाव से ठीक पहले करीब 17 साल के निर्वासन के बाद स्वदेश लौटे तारिक रहमान अब प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं. यह बदलाव भारत-बांग्लादेश संबंधों को गहराई से प्रभावित करेगा. हसीना सरकार के दौरान दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत थी. सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, व्यापार और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा था. लेकिन बीएनपी की जीत के बाद भारत के रिश्तों में व्यापक बदलाव आ सकता है.

बीएनपी का नारा ‘फ्रेंड येस, मास्टर नो’ है, यानी भारत से दोस्ती तो रहेगी, लेकिन बांग्लादेश किसी एक ताकत का वर्चस्व स्वीकार नहीं करेगा. यह उसकी संतुलित विदेश नीति की दिशा में कदम बढ़ाने का संकेत देता है. बांग्लादेश पाकिस्तान और चीन के साथ भी संबंध मजबूत करना चाहता है.

कूटनीतिक और रणनीतिक प्रभाव

नई दिल्ली के लिए सबसे बड़ी चिंता सीमा सुरक्षा और आतंकवाद है. अतीत में बीएनपी की सरकारों पर भारत-विरोधी उग्रवादियों को शरण देने का आरोप लगा था. अब खुफिया जानकारी साझा करने और सीमा पर घुसपैठ रोकने की मजबूत व्यवस्था दोनों देशों में ट्रस्ट बिल्डिंग की पहली शर्त होगी. हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दा है. वर्ष 2024 के बाद हुए सांप्रदायिक तनावों के कारण भारत ने चिंता जताई थी. बीएनपी ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का वादा किया है, लेकिन उसके इस वादे पर भारत की नजर रहेगी.

क्या शेख हसीना को सौंपेगा भारत?

सबसे तात्कालिक टकराव शेख हसीना का प्रत्यर्पण है. हसीना भारत में शरण लिए हुए हैं और उन पर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप लगाए हैं. बीएनपी सरकार उन्हें प्रत्यर्पित करने की मांग करेगी, जो भारत के लिए मुश्किल फैसला होगा. इससे कूटनीतिक तनाव बढ़ सकता है.

पाकिस्तान-चीन के करीब जाने की आशंका

भारत को डर है कि बीएनपी चीन के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर और पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाएगा. यह भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति के लिए चुनौती बनेगा. हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि बीएनपी आर्थिक व्यावहारिकता अपनाएगा. व्यापार, ऊर्जा आयात और तीस्ता नदी जल-बंटवारे जैसे मुद्दों पर सहयोग जारी रहेगा. दोनों देशों के हित अलगाव से ज्यादा सहयोग में हैं. भारतीय अधिकारी अब एक ही दल के साथ संबंध न रखने की नीति अपना रहे हैं. वे बीएनपी से सीधे संपर्क बढ़ा रहे हैं.

जमात ए इस्लामी जीतती तो क्या होता

अगर बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी जीत जाती तो क्या होता? इसका जवाब बहुत सहज है. भारत के साथ संबंध और जटिल हो जाते. जमात को भारत-विरोधी और इस्लामी कट्टरपंथी माना जाता है. उसके सत्ता में आने से हिंदू अल्पसंख्यकों पर खतरा और बढ़ जाता, सांप्रदायिक तनाव भड़कते और भारत-बांग्लादेश संबंध और खराब हो सकते थे. वह पाकिस्तान और चीन के साथ गठजोड़ मजबूत करता. जमात की जीत क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़ा झटका होती, क्योंकि यह पार्टी सेक्युलर बांग्लादेश की अवधारणा को ही स्वीकार नहीं करती.

क्या आपसी रिश्ते रीसेट होंगे?

बांग्लादेश में बीएनपी की जीत से भारत के साथ संबंध पूरी तरह टूटने की बजाय रीसेट होने की संभावना है. तारिक रहमान की टीम ने कहा है कि बांग्लादेश भारत के साथ बराबरी और आपसी सम्मान पर आधारित संबंध चाहता है. यदि दोनों पक्ष व्यावहारिक रहें- जैसे तीस्ता संधि पर समझौता, व्यापार बढ़ाना तो संबंध स्थिर रह सकते हैं. लेकिन शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग और अल्पसंख्यक सुरक्षा जैसे मुद्दे शुरुआती चुनौतियां हैं. कुल मिलाकर, तारिक रहमान की जीत भारत के लिए बहुत सुखद नहीं तो बुरा भी नहीं है. जमात की जीत से दोनों देशों के संबंध बुरे दौर में पहुंच जाते.

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