कभी 15 मिनट मंच से उतार दिए गए थे उस्ताद अमीर खां, फिर यूं रचा संगीत का इतिहास, संघर्ष से शिखर तक अनोखी है कहानी
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कभी महज 15 मिनट में मंच से उतार दिए गए उस्ताद अमीर खां आगे चलकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे मजबूत पहचान बन गए. अपनी अलग और गंभीर गायकी के दम पर उन्होंने न सिर्फ इंदौर घराने को नई ऊंचाई दी, बल्कि शास्त्रीय संगीत को आम लोगों तक भी पहुंचाया. उनकी पुण्यतिथि पर देश उनके संघर्ष और सुरों की विरासत को याद कर रहा है.

अपमान सहकर मिला सम्मान
नई दिल्ली. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उस्ताद अमीर खां का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है. 13 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें याद करता है. आज उन्हें शास्त्रीय संगीत की पहचान माना जाता है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उन्हें महज 15 मिनट में मंच से उतार दिया गया था.
उस्ताद अमीर खां का जन्म 15 अगस्त 1912 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था. वह एक संगीत परिवार से ताल्लुक रखते थे. उनके पिता शाहमीर खां सारंगी वादक थे और इंदौर के होलकर दरबार से जुड़े थे. उनके दादा भी बहादुर शाह जफर के दरबार में गायक रह चुके थे. यानी संगीत उन्हें विरासत में मिला था.
बचपन से मिला सुरों का माहौल
बचपन से ही घर में सुरों का माहौल था, लेकिन जब वह सिर्फ 9 साल के थे तब उनकी मां का निधन हो गया. इस घटना ने उन्हें अंदर से काफी संवेदनशील बना दिया. शुरुआत में उनके पिता ने उन्हें सारंगी सिखाई, लेकिन उनका मन गायन में ज्यादा लगता था. बाद में उन्होंने गायकी की गहरी तालीम ली. तबला भी सीखा, जिससे उनकी लय की समझ और मजबूत हो गई.
15 मिनट में मंच से उतारे गए थे उस्ताद
1934 में वह बंबई पहुंचे और वहां मंच पर गाना शुरू किया. लेकिन शुरुआती दौर आसान नहीं था. उनकी गायकी बेहद धीमी, गंभीर और ठहरी हुई होती थी. आम श्रोता वर्ग उस वक्त उस अंदाज को तुरंत समझ नहीं पाते थे. एक बार तो एक संगीत सम्मेलन में उन्हें सिर्फ 15 मिनट बाद ही गाना बंद करने को कह दिया गया. लोगों ने उनसे ठुमरी गाने की फरमाइश की, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया. उनके लिए संगीत से समझौता करना संभव नहीं था.
बता दें कि उन्होंने ख्याल और ध्रुपद की परंपराओं को मिलाकर अपनी अलग शैली तैयार की. यही शैली आगे चलकर इंदौर घराने के नाम से मशहूर हुई. उनकी गायकी को अंतर्मुखी कहा जाता था. वह मंच पर दिखावे से दूर रहते और सुरों को धीरे धीरे खोलते थे.दिलचस्प बात यह है कि शास्त्रीय संगीत के इतने बड़े साधक होने के बावजूद उन्होंने फिल्मों में भी गाया. बैजू बावरा, शबाब, झनक झनक पायल बाजे और गूंज उठी शहनाई जैसी फिल्मों में उनकी आवाज ने शास्त्रीय संगीत को आम लोगों तक पहुंचाया.
उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. 13 फरवरी 1974 को कोलकाता में एक सड़क हादसे में उनका निधन हो गया. लेकिन उनकी आवाज और उनका योगदान आज भी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में गूंजता है.
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न्यूज 18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार का डिजिटल मीडिया में 9 सालों का अनुभव है. एंटरटेनमेंट रिपोर्टिंग, लेखन, फिल्म रिव्यू और इंटरव्यू में विशेषज्ञता है. मुनीष ने जामिया मिल्लिया इ…और पढ़ें