No-Confidence Motion Against Speaker Om Birla | ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: विपक्ष की रणनीति और इतिहास

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No-Confidence Motion Against Speaker OM Birla News: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को स्पीकर ओम बिरला ने बोलने से रोका. इसलिए विपक्ष उन्हें हटाना चाहता है. पिछले कई दिनों से लोकसभा में हंगामे के बाद स्पीकर के खिलाफ विपक्ष ने मंगलवार को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया. अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा के 118 सांसदों के दस्तखत हैं. राहुल गांधी का दस्तखत उसमें नहीं है और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने भी इससे दूरी बना ली है. पार्टी महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी स्पीकर के खिलाफ असहमति की बात तो करते हैं, लेकिन वे अपनी कुछ शर्तें कांग्रेस से मनवाना चाहते हैं. तभी टीएमसी अविश्वास प्रस्ताव पर कांग्रेस का साथ देगी. बहरहाल, अविश्वास प्रस्ताव पर 9 मार्च को लोकसभा में चर्चा होगी. जानकारी आ रही है कि चर्चा के दिन तक स्पीकर ने सदन में आने से मना कर दिया है.

स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव क्यों?

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस में पूर्व थल सेना अध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के हवाले से अपनी बात रखनी चाही. स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का हवाला देकर अप्रकाशित पुस्तक के कंटेंट पर चर्चा करने से रोक दिया. उसके बाद से ही विपक्ष, खासकर कांग्रेस, ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है. नरवणे भारतीय थल सेना के 28वें सेना प्रमुख रहे हैं. उन्होंने गलवान घाटी में चीन के साथ सीमा गतिरोध के दौरान सेना का नेतृत्व किया था. उन्होंने संस्मरणात्मक पुस्तक लिखी है, जिसमें गलवान में चीनी टैंकों के घुसने की जानकारी है. राहुल गांधी ने उसका जिक्र किया, लेकिन स्पीकर की मनाही के कारण उसे रिकार्ड से हटा दिया गया. बिना मंजूरी प्रकाशित किताब को राहुल ने बाद में मीडिया को दिखाया भी, लेकिन प्रकाशक ने ऐसी कोई किताब छपी होने से इनकार किया है. अब तो इसे लेकर दिल्ली पुलिस ने केस भी दर्ज कर लिया है.

स्पीकर के खिलाफ चौथा प्रस्ताव

आजादी के बाद से अब तक यह चौथा अविश्वास प्रस्ताव है, जो स्पीकर के खिलाफ लाया गया है. इससे पहले कांग्रेस शासन में 3 स्पीकर के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था. हर बार विपक्ष को हारना पड़ा. इस बार भी विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव गिर जाए तो आश्चर्य नहीं. इसलिए कि सत्ताधारी एनडीए के पास पर्याप्त समर्थन है. इसके बावजूद ओम बिरला ने अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दिन तक सदन में न जाने का फैसला किया है. पिछले ही साल विपक्ष ने अपनी ताकत आजमाई थी. विपक्ष ने राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन चेयर पर बैठे उपसभापति हरिवंश ने उसे मंजूर नहीं किया.

3 और स्पीकर भी आया प्रस्ताव

1947 में आजादी मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ 4 बार लाया गया है. 3 बार तो विपक्ष को मुंह की खानी पड़ी. चौथी बार ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है. इस बार क्या होगा, यह 9 मार्च को पता चलेगा. हालांकि एनडीए के बहुमत को देखते हुए ज्यादा संभावना है कि यह सिर्फ विपक्ष का प्रतीकात्मक विरोध ही साबित होगा. स्पीकर की सेहत पर शायद ही इसका कोई असर हो. जिन 3 स्पीकर के खिलाफ अब तक प्रस्ताव आए हैं, उनमें जीवी मावलंकर, सरदार हुकुम सिंह और बलराम जाखड़ शामिल हैं. तीनों मामले कांग्रेस शासन के हैं. एनडीए सरकार के 11-12 साल के कार्यकाल में स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का यह पहला मामला है.

लोकसभा में हंगामे के बाद स्पीकर के खिलाफ विपक्ष ने मंगलवार को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया.

अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया

संविधान में अविश्वास प्रस्ताव के अलग-अलग नियम हैं. स्पीकर के खिलाफ अनुच्छेद 94 के तहत अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है. सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नियम 198 के तहत आता है. स्पीकर को हटाने के लिए कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना अनिवार्य होता है. इसके लिए ठोस कारण बताने पड़ते हैं. हालांकि अभी तक आए अविश्वास प्रस्ताव पर किसी स्पीकर को हटाने का मामला नहीं आया है. हर बार प्रस्ताव गिरता रहा है या खारिज होता आया है. राज्यसभा में भी पहले उपसभापति हरिवंश के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था, लेकिन मंजूर नहीं हुआ. उसके बाद सभापति जगदीप धनखड़ को विपक्ष ने निशाने पर लिया, लेकिन उसे हरिवंश ने मंजूर नहीं किया.

चौथा अविश्वास प्रस्ताव आया

आजादी के 7 साल बाद 18 दिसंबर 1954 को भारत के पहले लोकसभा स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था. आजाद भारत का यह पहला मामला था. विपक्षी नेता सुचेता कृपलानी और अन्य सांसदों ने नोटिस दिया था. तब भी आरोप स्पीकर की निष्पक्षता की कमी के थे. प्रस्ताव पर बहस तो हुई, लेकिन यह प्रस्ताव खारिज हो गया. तब जवाहर लाल नेहरू पीएम थे. दूसरा अवसर 24 नवंबर 1966 को आया. स्पीकर सरदार हुकम सिंह के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. समाजवादी नेता मधु लिमए के नेतृत्व में विपक्ष गोलबंद हुआ था. समर्थन में 50 से कम सदस्य थे, इसलिए प्रस्ताव पेश नहीं हो सका. तीसरा मामला 15 अप्रैल 1987 का है, जब स्पीकर बलराम जाखड़ के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव दिया. हालांकि यह भी नाकाम रहा था.

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