बड़ा ही पराक्रमी था यह समुदाय, सम्राट अशोक को तक इनके आगे माननी पड़ी हार, महराजगंज से जुड़ा है इतिहास

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Mahrajganj News: महराजगंज जिले के चौक क्षेत्र में स्थित रामग्राम स्तूप अपने प्राचीन बौद्धकालीन इतिहास के लिए प्रसिद्ध है. इस स्थल का संबंध कोलिय समुदाय से जुड़ा है, जो अपने साहस और आत्मसम्मान के लिए जाना जाता था. इतिहासकारों के अनुसार कोल के वृक्षों की अधिकता से इस समुदाय का नाम कोलिय पड़ा. सम्राट अशोक भी यहां स्तूप की खुदाई नहीं करा सके और कोलिय समुदाय के विरोध के आगे झुकना पड़ा.

महराजगंज: उत्तर प्रदेश का महराजगंज जिला देश के आखिरी छोर पर स्थित है. इसके साथ ही यह जिला पड़ोसी देश नेपाल के साथ सीमा भी साझा करता है. महराजगंज जिले की बात करें तो यह अपने भौगोलिक स्थिति के साथ साथ ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जाना जाता है. जिले के अलग अलग क्षेत्रों में बहुत से धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं. महराजगंज जिले के चौक क्षेत्र में ऐसा ही एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थल रामग्राम स्तूप मौजूद है, जो अपने प्राचीन बौद्धकालीन इतिहास के लिए जाना जाता है. इस ऐतिहासिक स्थल से  कोलिय समुदाय का इतिहास भी जुड़ा हुआ है. इतिहास में बौद्धकाल से ही कोलिय समुदाय अपने धर्म और आत्मसम्मान की स्वतंत्रता के लिए बहुत प्रसिद्ध था. इतिहास में प्रचलित अलग अलग कहानियों में इस समुदाय के साहस, एकता और संघर्ष की कहानियों का जिक्र मिलता है.

कोल के वृक्षों की वजह से कोलिय पड़ा इनका नाम
महराजगंज जिले के प्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार डॉ परशुराम गुप्त ने लोकल 18 से बातचीत के दौरान बताया कि महराजगंज के चौक क्षेत्र में स्थित रामग्राम का संबंध भगवान गौतम बुद्ध से है. इतिहास में बौद्धकाल से पहले एक राजा राम यहां आए थे. उन्होंने इस क्षेत्र में अत्यधिक संख्या में मौजूद कोल के वृक्ष जिन्हें हम स्थानीय भाषा में कठजमुनिया के नाम से भी जानते हैं, उसको कटवाकर अपना साम्राज्य बनाया. उस राजा के सोलह संतान थी, जिनको उन्होंने अलग हिस्सों का क्षेत्र देकर उन्हें जिम्मेदारी संभालने को कहा. उन्हीं सोलह क्षेत्रों में से एक के अधीन यह क्षेत्र भी आता था. यहां पर कोल के वृक्ष की बहुत बड़ी संख्या थी, जिसकी वजह से यहां के लोगों को कोलिय और नाग वंश से होने की वजह से नाग भी कहा जाता था. इतिहास में इस कोलिय समुदाय का बहुत बड़ा योगदान रहा है.

सम्राट अशोक ने भी कोलिय समुदाय के सामने मानी हार
इतिहास में बौद्धकाल के समय में सम्राट अशोक दुनिया के अलग अलग हिस्सों में मौजूद बौद्ध स्तूप की खुदाई करा रहा था, तो इस दौरान वह यहां भी आया था. वह अन्य दूसरे बौद्ध स्तूप की तरह इस बौद्ध स्तूप का भी उत्खनन करना चाहता था. इसकी सूचना कोलिय समुदाय को मिलने पर उन्होंने सम्राट अशोक के इस कार्य का विरोध शुरू किया. यह विरोध धीरे धीरे बढ़ने लगा और ऐसा भी कहा जाता है कि सम्राट अशोक को यहां पर रामग्राम बौद्ध स्तूप के खुदाई के लिए एक सप्ताह तक रुकना पड़ा. इसके बावजूद भी उसे सफलता नहीं हासिल हुई. इसके साथ ही उसे कोलिय समुदाय के संघर्ष के बाद उनके सामने झुकना पड़ा और स्तूप के बिना खुदाई के उसे वापस भी लौटना पड़ा. कोलिय समुदाय के साहस और संघर्षों का परिणाम रहा कि आज के समय में भी यह बौद्ध स्तूप सबसे अलग है.

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Lalit Bhatt

पिछले एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं. 2010 में प्रिंट मीडिया से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की, जिसके बाद यह सफर निरंतर आगे बढ़ता गया. प्रिंट, टीवी और डिजिटल-तीनों ही माध्यमों म…और पढ़ें

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