भारत में जातियों पर क्या कहती है डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रसिद्ध किताब, उसकी 10 बातें

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यूजीसी की भेदभाव संबंधी नई गाइडलाइंस ने देश में अगड़ा और पिछड़ा को लेकर एक फिर बड़ा विवाद छेड़ दिया है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया है. लेकिन हमें डॉ. भीमराव अंबेडकर की जातियों से संबंधित किताब के बारे में जानना चाहिए. इस किताब की दस मुख्य बातें.

भारत में जातियों पर क्या कहती है डॉ. अंबेडकर की प्रसिद्ध किताब, उसकी 10 बातें

डॉ. भीमराव अंबेडकर की जाति पर सबसे प्रसिद्ध और केंद्रीय किताब है एनहिलेशन ऑफ कास्ट यानि जाति का विनाश. दरअसल ये किताब उनके एक प्रसिद्ध भाषण पर आधारित है, जिसे वह दे नहीं पाए थे, बाद ये भाषण किताब के रूप में छपा. इसमें वह देश में जातियों के उदय, इसका मनोविज्ञान और गंभीर असर के साथ इससे समाज में पैदा हुई ऊंच नीच और बंटवारे की बात करते हैं.

इस किताब का प्रकाशन 1936 में हुआ. आज भी ये अंबेडकर की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में है.ये मूल रूप से लाहौर की जात-पात तोड़क मंडल के सम्मेलन में दिया जाने वाला भाषण था, जिसे बाद में किताब के रूप में छापा गया. वैसे ये कहना चाहिए कि वो ये भाषण दे नहीं पाए थे. इसे रद्द कर दिया गया. उसी रद्दीकरण से किताब पैदा हुई.

लाहौर में एक आयोजन जात पात तोड़क मंडल की ओर से हुआ. अंबेडकर को प्रेसिडेंटियल एड्रेस देने के लिए बुलाया गया. लेकिन आयोजकों ने भाषण पढ़कर कहा इसमें तो शास्त्रों और हिंदू धर्म की तीखी आलोचना है, इसे बिना काट-छांट के नहीं पढ़ा जा सकता. अंबेडकर का जवाब था, “मैं अपने विचारों में संशोधन नहीं करूंगा.” नतीजतन सम्मेलन ही रद्द कर दिया गया. अंबेडकर ने भाषण को स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में छाप दिया.

मूल पाठ लगभग 50–60 पन्नों का है. शब्दों में देखें तो ये किताब करीब 18–20 हज़ार शब्दों की है. उनके इस किताब से कई जाति विरोधी नेता नाराज हो गए.

उन्हें लगा अंबेडकर “हद से ज़्यादा कटु” हैं. “हिंदू धर्म को तोड़ रहे हैं” गांधीजी ने 1936 में अपने अखबार हरिजन में इस पर लेख लिखा, कहा, “अंबेडकर का गुस्सा जायज़ है, लेकिन तरीका विनाशकारी. गांधी मानते थे कि जाति गलत है लेकिन शास्त्रों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. इस पर गांधी और अंबेडकर में तर्क भी चला.

यह बहस भारतीय सामाजिक चिंतन की सबसे बड़ी बहसों में से एक बन गई. पहली बार किसी नेता ने बिना माफी, बिना नरमी, बगैर बिना धर्मभीरुता जाति को सीधे जड़ से चुनौती दी. इसलिए यह किताब दलित आंदोलन की वैचारिक रीढ़ बन गई. तब मुख्यधारा के अखबारों ने इसे या तो नजरंदाज किया या “अति उग्र” कहकर खारिज किया.

अंबेडकर कहते हैं कि दुनिया में हर जगह असमानताएं रहीं लेकिन भारत की जाति व्यवस्था सबसे अलग और अकेली है. क्योंकि ये जन्म के साथ बहुत कुछ तय कर देती हैं. दुनिया में वर्ग व्यवस्था आर्थिक होती है. भारत में जाति व्यवस्था धार्मिक–नैतिक श्रेणीकरण है. कौन शुद्ध है, कौन अपवित्र – ये तय करता है. यह व्यवस्था सामूहिक विद्रोह को असंभव बनाती है.

उसी किताब के आधार पर 10 मुख्य बातें

 जाति श्रम-विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है – अंबेडकर कहते हैं कि जाति व्यवस्था काम का बंटवारा नहीं करती बल्कि इंसानों को ऊंच-नीच में बांटती है, जिससे सामाजिक गतिशीलता खत्म हो जाती है. जाति व्यक्ति को जन्म के आधार पर व्य.वसाय चुनने से रोकती है, जिससे बेरोजगारी और विकास में बाधा आती है। यह आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक है

जाति का आधार धर्मग्रंथ हैं, सामाजिक व्यवहार नहीं – वे साफ कहते हैं कि जाति व्यवस्था को मनुस्मृति, वेदों की व्याख्याएं और शास्त्रीय परंपराएं वैधता देती हैं – सिर्फ सामाजिक आदतें नहीं.

सुधार से नहीं, विनाश से हल होगा जाति का सवाल – अंबेडकर का सबसे तीखा तर्क था, “जाति को सुधारने की बात बेमानी है, उसे नष्ट करना होगा.”

अंतर्जातीय विवाह ही जाति तोड़ने का असली हथियार है – वे मानते हैं कि खान-पान या मेल-जोल से नहीं, बल्कि अंतर जातीय विवाह से ही जाति का ढांचा टूटेगा.

हिंदू समाज नैतिक समुदाय नहीं, जातिगत समूहों का ढांचा है – उनका तर्क है कि जाति व्यवस्था में “हिंदू समाज नाम की कोई चीज़ नहीं है—सिर्फ जातियां हैं.”

ब्राह्मणवाद – अंबेडकर साफ फर्क करते हैं. वे किसी जाति के व्यक्ति से नहीं, बल्कि वर्चस्ववादी विचारधारा (ब्राह्मणवाद) से टकराते हैं.

राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक लोकतंत्र के बिना खोखला है – अगर समाज में बराबरी नहीं है, तो वोट का अधिकार भी वास्तविक मुक्ति नहीं देता.

धर्म अगर स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व के खिलाफ है तो उसे बदला जाना चाहिए. अंबेडकर धर्म को “पवित्र” मानकर नहीं, मानवीय मूल्यों की कसौटी पर परखते हैं.अंबेडकर मिथकों को खारिज करते हैं, जैसे रक्त की शुद्धता और कहते हैं कि जाति सामाजिक निर्माण है, न कि प्राकृतिक.

ऊंची जातियों का सुधारवाद पाखंड है – वे कहते हैं कि ऊंची जातियों का “जाति विरोध” अक्सर नैतिक भाषण तक सीमित रहता है – व्यवहार में वे विशेषाधिकार नहीं छोड़ते.

दलितों की मुक्ति दूसरों की दया से नहीं, आत्म-संघर्ष से होगी – अंबेडकर चेतावनी देते हैं कि “कोई समाज अपनी विशेषाधिकार वाली स्थिति स्वेच्छा से नहीं छोड़ता.”

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Sanjay Srivastavaडिप्टी एडीटर

लेखक न्यूज18 में डिप्टी एडीटर हैं. प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में काम करने का 30 सालों से ज्यादा का अनुभव. लंबे पत्रकारिता जीवन में लोकल रिपोर्टिंग से लेकर खेल पत्रकारिता का अनुभव. रिसर्च जैसे विषयों में खास…और पढ़ें

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