Republic Day Special: कानपुर के 10 रत्न! संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले विशिष्टजन, जानें क्या है इनकी कहानी
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Ten gems of Kanpur: कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप शुक्ला के अनुसार दूसरे विश्वयुद्ध के बाद देश में आजादी और गणतंत्र को लेकर माहौल बनने लगा था. दिसंबर 1946 में संविधान निर्मात्री समिति का गठन हुआ. जिसमें पूरे देश से 300 से अधिक सदस्य शामिल थे. इनमें कानपुर से नौ विशिष्टजन और उन्नाव से एक सदस्य शामिल किए गए थे. जिनकी कर्मभूमि कानपुर रही. इसी कारण इन्हें कानपुर के 10 रत्नों के रूप में जाना जाता है.
कानपुर न केवल आजादी की लड़ाई में बल्कि देश के गणतंत्र बनने और संविधान लागू होने की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला शहर रहा है. बहुत कम लोग जानते है कि जब देश के लिए संविधान तैयार किया जा रहा था. तब संविधान निर्मात्री समिति में कानपुर के 10 विशिष्टजन शामिल थे. इन महान लोगों के विचार अनुभव और संघर्ष ने भारत को एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा देने में अहम योगदान दिया. यही वजह है कि हर गणतंत्र दिवस पर कानपुर के लोग गर्व के साथ इन रत्नों को याद करते है.
कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप शुक्ला के अनुसार दूसरे विश्वयुद्ध के बाद देश में आजादी और गणतंत्र को लेकर माहौल बनने लगा था. दिसंबर 1946 में संविधान निर्मात्री समिति का गठन हुआ. जिसमें पूरे देश से 300 से अधिक सदस्य शामिल थे. इनमें कानपुर से नौ विशिष्टजन और उन्नाव से एक सदस्य शामिल किए गए थे. जिनकी कर्मभूमि कानपुर रही. इसी कारण इन्हें कानपुर के 10 रत्नों के रूप में जाना जाता है.
इन 10 रत्नों में सबसे प्रमुख नाम मौलाना हसरत मोहानी का आता है. वे स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ नामचीन पत्रकार और प्रखर विचारक भी थे. कानपुर के मुस्लिम क्षेत्रों में उनका गहरा प्रभाव था और स्वदेशी भंडार की स्थापना में उनकी अहम भूमिका रही. इसी तरह वेंकटेशनारायण तिवारी हिंदी के बड़े हितैषी माने जाते थे. जिनके नाम से पूरा शिवाला क्षेत्र बसा. बालकृष्ण शर्मा नवीन, गणेश शंकर विद्यार्थी के बेहद करीबी थे और पंडित नेहरू के प्रिय माने जाते थे. साहित्य और राष्ट्रवाद दोनों में उनका योगदान याद किया जाता है.
कानपुर के 10 रत्नों में हरिहर नाथ शास्त्री का नाम मजदूर आंदोलनों के लिए विशेष रूप से लिया जाता है. उन्हीं के नाम पर आज शास्त्री नगर बसा हुआ है. संविधान लागू होने के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा चेहरा बने शिब्बल लाल सक्सेना ने लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत किया. उद्योग और पूंजी जगत से जुड़े सर जेपी श्रीवास्तव और सर पदमपत सिंहानिया ने आर्थिक दृष्टि से देश को दिशा देने में योगदान दिया. वहीं दलित समाज की मजबूत आवाज बने दयाल दास भगत, जो कुलीबाजार से आते थे, सामाजिक समानता के लिए हमेशा याद किए जाते है. उन्नाव से होकर भी कानपुर की कर्मभूमि वाले विशंभर दयाल त्रिपाठी को भी इन 10 रत्नों में शामिल किया जाता है.
इन सभी विशिष्टजनों ने मिलकर संविधान निर्माण में अपनी सोच, अनुभव और संघर्ष का योगदान दिया. आज जब हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है तो कानपुर के इतिहास में इन 10 रत्नों का नाम सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है. यह शहर की वह विरासत है जो आने वाली पीढ़ियों को लोकतंत्र और संविधान के महत्व की याद दिलाती रहेगी.
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काशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. अभी लोकल18 यूपी के कॉर्डिनेटर की…और पढ़ें